साखी-32
ओ निज तीरथ तालवो, जोति सही जित श्याम की
इस रचना का भावार्थ उपलब्ध नहीं है।
सवैया
गुर सो दाता नाहिं, परमगति गुर ते पाई।
भवसागर वहे जात, मुक्त की न्हाव लगाई।
हर कोई है प्रभाव, वचन हूं कोऊ न टालै।
जीव सुजीवां सोधि, परित पहलो की पालै।
मुकत इन्याज मांडी जैही, खालक खेवणहार
लूणकरण तब दास है, प्रभु मोहे पार उतार।
ओ निज तीरथ तालवो, जोति सही जित श्याम की
देव बरोबर कोई नही, महिमा घणी मुकाम की
महिमा तो घणी मुकाम सोहै, पैडियां पग दीजिये
झूलरा जमाति छाजा, देख रचना रीझिये
होम यज्ञ जश जहां कीजे, धियाइये पूरो धणी
जिसो धयावै तिसो पावै, तालवो तीर्थ सही(१)
चोकी बणी मुकाम की, श्याम श्वेत पीलो बणी
कारीगर मेल मिली, छींट वरणी अति सोहणी
बणी चोकी मंझ तीर्थ, ज्ञान चरचा अति घणी
जहां करै चौहलर पंछिया, मुकुट शोभा भली बणी
चौंतरे अति चूंप दीसे, भुरज शोभा अति घणी
गुगल की महकार आवै, चौंतरे चौकी बणी (२)
खिड़की पालक देहरे सूल सदा अति सोहणी
हर हूजरैं दीसैं भली, थिरकी थानि सुहावणी
थिरकी थानि सुहावणी, जहां चांदनो चहूँ दिशा
झलके जंझीर देव स्वर्गा, जोति जहां बिसो बिसा
छाजा तो छाजै ताल बाजै, काज हरि सेवा सरे
दीसे अति सुहावणी खिड़की तो पालक देहरे (३)
कली विराजै कांगरे, शोभा मुकुट बखाणिये
रूखां बलि रल आवण श्याम सही जित जाणिये
जाणिये जित श्याम सतगुरु, पात हरि जन पेखणा
इण्डो तो मुकाम सोहै, देव प्रीति देखणा
कलश अर त्रिशुल झलकै, भांति हर मेली मिली
देख शोभा कह ‘केशो’, कांगरे सोहै कली (४)