साखी-31
महिपत मच्छ अवतार, संखासुर संतापिया
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सवैया
करो साध सूं गोष्ठी करो सुमारग साकरी।
करो नेम ध्रम कथ करो हरी जाप उद्यौ करी
करो कथ केवलो, करो सात सील सु करूणी।
करो जीभ जीकार करो उदया घट करणो।
करो कॉम जको गुरू दखयो गुरू वरजी सोई न करी।
कली राखी लाज कुल उजलौं करजोड़ो वास बेकुन्ठ करी।।
महिपत मच्छ अवतार, संखासुर संतापिया
जन्म हुओ तिण वार, जल में जाय बुहावियो
जल में जाय बुहावियो नैं, माता भयी सधीर
संखावती सहेलियां साथै, गई जल भर तीर
दीठो मच्छ रमंतो रेती, काढ लियो कर धार
सूक्ष्म रूप धरयो करुणानिधि, महिपाल मच्छ अवतार
संखासुर संतापियो (१)
कच्छ रूपी किरतार, मल मद कीचकनै हन्यो
बैठो समंद मंझार, वेद लिया ब्रह्मा तणो
वेद लिया ब्रह्मा तणों नैं, बैठों संमद मंझार
रीता हाथां जगदगुरु, हरि से करी पुकार
वासग नेत्यो मेर मथाणी, कर कर साई सार
इण विध रूप रच्यो मेणावत, कच्छ रूपी किरतार
मल मद कीचकनै हन्यो (२)
धर वराह अवतार, मुर दाणूं हरि मारियो
डाढ़ा दई पसार, सगलो साथ सिंघारियो
सगलो साथ सिंघारियो नैं, पापी किया पहमाल
मुख में रोल रवे ज्यूं राख्या, डाढा वीच दयाल
अपणा संत उबारिया, सही सिरजणहार
पुष्कर तीर्थ परगट कियो, धर वराह अवतार
मुर दाणूं हरि मरियो (३)
बाबै धारियो नृसिंह रूप, पत राखी प्रहलाद की
छूट गई करतूत, आवाज सुणी सिंह साध की
आवाज सुणी सिंह साध की नैं, भाज गयो हंकार
दाणूं भाग्यो डरपा लाग्यो, कर पकड़यो करतार
किया पावे आपका, खाड खिणंता कूप
‘हरजी’ संतां कारणे, बाबे धारियो नृसिंह रूप
पत राखी प्रहलाद की (४)