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गुरु जम्भेश्वर भगवान
संग्रह205 / 157
प्रचलित छन्दा की साखी

साखी-30 राग धनाश्री

मेधा नाम बैकुंठ, अखंड जोत जहां राजिये

इस रचना का भावार्थ उपलब्ध नहीं है।

सवैया

किया जो बहुआ पाप, जाप तो मना विसारे।

मोत जहां घाल्या घाव, गऊ को तापसी मोरे।।

चुगता हेरा मोर चोर की संगत कीनी।

कहा मोसिया मणिहार आथ अब लाकी लीनी।

विदोषी बहिन सुवासिणी कन्या दान अधिका लिया।

ध्रुव समझावे माता ने विकर्म कर्म आपां किया।

मेधा नाम बैकुंठ, अखंड जोत जहां राजिये

झिगमिग जोत प्रकाश, वां रो पार न पाविये

वां रो पार न पाविये नैं, झिगमिग जोत प्रकाश

सूरज जहां जुं है नहीं, कोट तणो रवि प्रकाश

शशियर जहां जुं है नहीं, उषण तासण नहीं होय

पावक तहां दरशै नहीं, शीत नहीं है कोय

अखंड जोत जहां राजिये (१)

सत चित्त आनन्द रूप, एकोहुं बहुता हुवै

कियो शब्द प्रकाश, प्रकृति भई तिहिं जोत सूं

प्रकृति भई तिहिं जोत सूं नैं, त्रिगुणी वृत्ति धार

सतोगुण रजोगुण तमोगुण, कियो बोहोत विस्तार

तीन देव तांह मां भया, ब्रह्मा विष्णु महेश

या सूं सारो जगत भयो, काट्यो कोट कलेश

एकोहुं बहुता हुवै (२)

जिन रच्यो ब्रह्मांड, तीन लोक चवदा भवन

मनु मरिच्यादि होय, देव दानूं प्रकट करन

देव दानूं प्रगट किया नैं, चौरासी लख जीव

और जूण भिन्न भिन्न करी, सबको सतगुरु सीव

जड़चेतन रचना रची, कियो ओदर मां बास

ज्ञान बिना नहीं धयान है, सच्चिदानन्द को भास

सतगुरु बिना नहीं पाइये (३)

सिंवरो श्याम स्वरूप, आन देव नही धयाइये

विष्णु ओ ही जाप, मोक्ष परम पद पाइये

मोक्ष परम पद पाइये नैं, जो सिंवरो हरि नाम

मन इच्छा सारी हुवै, फलै मनोरथ काम

एकाग्रह मन को करो, दुबधया दूर मिटाय

सिंवरो साचै श्यामनै, जनम-मरण मिट जाय

आन देव नहीं धयाइये (४)

चरण शरण हरि नाम, भवसागर कूं लांघिये

भगतां भंजण भीड़, जुग-जुग मां जस गाइये

जुग-जुग मां जस गाइये नैं, संतां सदा सिहाय

दुकरती मार दुख मेट कै, दीन्हो धर्म बधाय

भक्तबछल भागवान कूं, भजिये आठों याम

भक्ति कियां भव ऊधरै, चरण शरण हरि नाम

भवसागर कूं लांघिये (५)

विष्णु परम दयाल, सो ही जम्भेश्वर अवतरयो

भगत सुधारण काज, कलु में पंथ प्रगट करयो

कलु में पंथ प्रगट करयो नैं, पापी किया पहमाल

पापी बोहोत प्रचाविया, सोध्या जीव निहाल

सुध जीव सोध्या सही, दीन्हो कवल निभाय

‘गोविंदराम’ कहै जंभ कूं, सिंवरो हित चित्त लाय

भरम न भूलो भाइयो (६)