साखी-70
करमणि चलणो इस संसार, संभल कर कर चालिये
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करमणि चलणो इस संसार, संभल कर कर चालिये
जीवड़ानै जोखो होय, सोई डर पालिये
पालियो सो डर चेत, अवसर राख मन अमरापुरी
करो सारी गुरु फुरमाई, चेत कर करणी खरी
मान आण पिछाण सतगुरु, पाप से मन पालिये
चेतणा संसार करमणि, संभल कर कर चालिय (१)
करमणि जपै विष्णु को नाम, जगत गुरु मन में रहे
भक्ति तणा न मैले माण, हीणो वैण न कहे
वैण हीणो न कहे करमां, रहा शिर कंधा मांडियो
साम रण संग्राम हूवो, मरणे को बीड़ो लियो
मैल माया जाल चाली, राख तागो पंथ को
स्वर्ग सामै पांव परठे, जपै नाम विष्णु को (२)
करमणि चलती सिंवरयो, श्याम शीर सत घणों
करमणि गौरां लिवी बुलाय, ओ अवसर छै आपणों
आपणों अवसर राम गौरां, लिखी कलम सो नहिं मिटै
जाय चौहटै शीश मांड्यो, लिखी स्याही ना मिटै
बाहि तेग समांहि आसुं, है-हैकारो बरतियो
धन्य तेरो धियान करमां, सीझती साको कियो (३)
गुरु फुरमाई खांडा धार, अवसर आपो सारिये
आपण जिवड़ो कबूल, पर जीव उबारिये
उबारिये जीव अरु जीव काजै, असुरां खोटो हियो
रूंखां ऊपर मरण धारयो, कीजै ज्यूं करणी कियो
करणी पाल उजाल सतपंथ, प्रेम तत्त्व उपाइयो
जीव काजै प्राण दीन्हे, कीयो गुरु गुरमाइयो (४)
करमां खड़ी छै खेजड़ियां काज, रैवासड़ी के चौहटे
सम्मत सोलासौ संसार, समय मंझ और इकसठे
इकसठे मंझ और जेठ मासे, कृष्ण पखे थावर दिने
बीज के दिन कियो पयाणों, सारियो सूधो मने
निरवाहि नाम न सीख मोटो, पांव दे बेड़े चढी
गुरु परसादे'वील्ह' बोलै, करमां अरु गौरां खड़ी (५)