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गुरु जम्भेश्वर भगवान
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साखी-69

जीवड़ा जप जगदीश, जंभेश्वर जीवां धणी

इस रचना का भावार्थ उपलब्ध नहीं है।

सवैया

वै महूँरत कब होय बाक विष्णु बणांवै।

चित चितवन सब साड ध्यान ह

राग द्रेश को त्याग विस्व एक ब्रह्मा ही भासै।

मन इन्द्री एक ईश्वर को आसै।

वहै बाण हिरदय लगै साध लक्ष इस बन्द

कह गुरू सन्त सूं बार बार यह वर चहूं।।

जीवड़ा जप जगदीश, जंभेश्वर जीवां धणी

धर्मे धरो धियान, नाश हुवै पापां तणी

पाप प्रलय करे प्रीतम, पार घर बासो दिये

अनंत पाप अघोर मेटे, हेत हरि राखो हिये

झूठ कपट कुलोभ परहरि, साधा वायक यूं सुणी

सांपजे सुखवास स्वर्गे, जीवड़ा जप जीवां धणी (१)

सुक्रत करि संसार, कथि मानो गुरु की कही

अवसर चेत अजाण, भल अवसर लाभे नहीं

नाहीं लाभे ऐसो अवसर, सुपह छोड़ कुपह क्यों पड़ो

कुटंब काचे कांय विलगो, प्राणियां पंथसिर खड़ो

कुल रीत एह अनेक इधकी, प्रीत पापां परहरो

हक हलाल पिछाण प्राणी, संसार सुक्रत यों करो (२)

सुख नांही संसार, जम बैरी वांसे बहै

विषमी कोट न ओट, रंगमहलां नांही रहै

रह न रंक फकीर राजा, हुंस करता हारिया

अश्वपति गजपति छत्रपति, मंझ महलां मारिया

लेवै लेखो आप खालक, लोक परले होय सही

विष्णु नाम संभाल प्राणी, संसार सुख कोई नही (३)

सुख सगलों स्वर्ग लोक, मन चिंता मन की मिटे

जित जैंवर न गंजे जीव, घट आउखो नां घटे

घटै न घटता आव प्राणी, जुरा जीव न झंपहि

वावं वेदन नाहिं व्यापे, काया काल न कंपहि

जित ताप सींवन रोग तिसनां, दया कर मेटो दई

कह 'केशो' करो क्रिया, स्वर्ग सुख पावो सही