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गुरु जम्भेश्वर भगवान
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साखी-68

पंदरासै अवतार लियो गुरु, आठम सोम अठोत्तरै

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पंदरासै अवतार लियो गुरु, आठम सोम अठोत्तरै

छापर नींबी दूणपुरै, गुरु आशा तिसनां न करै

न करे आशा नींद तिसनां, जगतपति जीवां धणी

मोह माया नहीं छाया, निरभय वाणी निरंजणी

सधर गुरू सूं स्वर्ग लाभे, कह्यो गुरु को जे करै

पंदरासै अवतार लियो गुरू, आठम सोम अठोत्तरै (१)

जप तप क्रिया जुगत मिल्या, म्हांनै पूरै गुरु परचाविया

क्षमा दया सत शील सही, कुपह तज सुपह आणिया

कुपह तज हरि सुपह आण्या, ज्ञान केवल पावियो

प्रहलादजी के कवल कारण, कृष्ण कलियुग आवियो

सैतान भूत प्रेत परहरो, भ्रम भागो भाइयो

जप तप क्रिया जुगत मिल्या, म्हांनै पूरे गुरु परचावियो (२)

काल बयालो कहत सही गुरु, अन्न दे जीव उबारिया

कातिक बदि हरि कलस थाप्यो, जुग जुग सतगुरु तारिया

जुग जुग सतगुरु तरण तारण, धरम धारया कलिजुगे

सुरताण राण बखाण सुरनर, परच गुरु लागा पगे

अंधियार घर मां सूर ऊगो, तिन तिथि तिमिर घटयो

कातिक बदि हरि कलस थाप्यो, पंथ बयाले प्रगटयो (३)

महर गुरु की मुक्ति हुवे, अजर जरै जीवत मरे

काठ संगीणी लोहा तिरे, साध संगत सेवक तिरे

सबल सिंघ के अजा शरणे, गुरु शरणागत ऊधरे

साधा संगत भक्ति हरि की, परम तत्त दुतर तिरे

आधीन होकर दीन बोले, कह्यो गुरु को कीजिये

'सुरजन' जन की बीणती, मोहि मुक्ति मारग दीजिये (४)