कांगणा मेरे बाले श्री रंग, अंति रूसनाइयां । बलीयड़ा तेरी बांहण सोहेदरा, देव ज सो मति माइया । बुलाय पटवा वल्या कांगण, और लाल गुंवालीया । स्याही सपेदी ओर रंग रची, नखे नख दीव लाइया । करंग चीकी इधक सोभा, जात्य वरणी न जाइया । दीप जप नांव हरि को, कांगैण रूसनाइयां ।१।
बाल कृष्ण के सौन्दर्य का वर्णन दीप कवि ने इस साखी में किया है। हाथों में कंगन हमारे बाल कृष्ण के शोभायमान हो रहे है। बलराम तुम्हारा भाई और सहोदरा तुम्हारी बहन तथा देवकी तुम्हारी माता वसुदेव तुम्हारे पिता ये सभी तुम्हारे परिवार बहुत अच्छे है। इनके साथ ही जसोदा नन्द बाबा ग्वाल बाल गोपियां गायें बछड़े यमुना का किनारा वृन्दावन गोकुल आदि शोभायमान हो रहे है। कृष्ण को कंगन अपने अपने घर बुलाकर गोपियां बहन भाई सहोदरा आदि पहनते है। नखों में हाथ में मेंहदी रची गयी है जो अति शोभायमान हो रही है। दीप कहते है कि इस प्रकार के श्रृंगार से सुसज्जित बाल गोपाल का नाम जपो आनन्द मंगल होगा ।१।
तेरो कांगणौ बाला चत्रभुज, रतन जड़ाइया । हीर मुकताहल, मोती मोल्य मंगाइयां । मोल्य मंगाए माय हितकारी, सुणौ पियारे जग धणी । महल्य मंगलचार गाव, रूप शोभा अंति घणी । ओपमा इधकार ओप, नगे नग मीलाइया । दीप जप नांव हरि कौ, कांगण रतन जड़ाइया ।२।
चतुर्भुज कृष्ण के हाथों में कंगन रत्नों से जड़े हुए पहनाये गये है। उन कंगन में हीरा मोती आदि रत्न मंगवाये गये और जग मालिक को शोभायमान किया गया। ग्राम की महिलाऐं मंगल गीत गा रही है। गीतों में कृष्ण के दिव्य रूप की शोभा का वर्णन कर रही है। अनेक उपमाएं देकर कृष्ण के दिव्य रूप को प्रगट करने का प्रयास कर रही है। शरीर पर कंगन आदि पहनाकर अनेक नगों से शरीर में प्रकाश द्विगुणित हो रहा है ।२।
तेरी खोलगी ग्रहण्य चत्रभुज, अंति रंग घोलिया । तेरी खोलगी राज्य दुलारी, जीस मन्य रलीया । राज्य दुलहन्य हसी दीलमां, रूप चत्रभुज मोहीया । कान्य कंठी कपोल कुमल, नैन काजल सोहीया । दांत दाड़यौ तीलगर गीया, कांमणी रतना लीया । दीप जपै नांव हरि कौ, डोरियां अंति घोलीया ।३।
वस्त्र सुन्दर पहनाया था जो भगवान के दिव्य रूप से अलंकृत हो रहे थे। जैसी राजदुलारी रूक्मणी को श्रृंगार से सुसज्जित किया था उससे ही कहीं अधिक कन्हैया भी विवाह के समय शोभायमान हो रहे थे। राज दुलारी त्रिभुवन स्वामी के रूप को देखकर मोहित हो रही थी। मंद मंद मुस्कराकर यह भाव प्रगट कर रही थी। उसी प्रकार दुल्हा बने कृष्ण भी अपने हाव भाव से अपनी भावना प्रगट कर रहे थे। गले में स्वर्ण कंठी कानों में कुण्डल नयनों में काजल शोभायमान हो रहा था। कन्हैया के दांत दाड़िम जैसे तेल वर्ण की अंगरखी युवतियां ऐसे सौम्य रूप को देखकर बारंबार बलिहार जाती है। दीप कहते है कि ऐसे दिव्य अलौकिक रूप गुण सम्पन्न श्री चतुर्भुज धारी श्री कृष्ण का भजन जप करें ।३।
कीसन जी जीतौ जी करि हांसी, वसदेव को नंदन कहीय । मथुरा को वासी किसन कहीय, नीकट जमनां जल वह । कान्ह होयक गऊ चराई, कीसन होय परसिध रह । असर सिधारै कारज सरै, प्रीतम सु प्रीतियां । दीप जप नांव हरि कौ, कीसन जी हरि जीतिया ।४।
वर वधु के गृह प्रवेश के शुभ खेल में सखियां कहने लगी कृष्ण जी आपको ही जीतना है। कहीं हार गये तो फिर सदा के लिये हारते ही जाओगे, आपकी हंसी होगी। आप वसुदेवजी के पुत्र कहलाते हो और मथुरा के वासी हो। आपके निकट यमुना जी बहती है। आपने कन्हैया बनकर गऊवें चराई है। इस समय द्वारिकाधीश किसन होकर प्रसिद्ध है। आपने बड़े-बड़े असुरों का संहार किया है। अनेकानेक लोगों का कार्य पूर्ण किया है। प्रिय जनों के आप प्रीतम हो, दुष्टों के आप काल भी हो। आप सर्व समर्थ होते हुए इस रूक्मणी कृष्ण के विवाह खेल में हार गये तो हंसी के पात्र बन जाओगे। कवि दीप कहते है कि ऐसे भगवान श्री कृष्ण के नाम का जप करे जिस प्रकार से कृष्णजी खेल में जीत गये। उसी प्रकार से आप भी जगत के खेल में जीत जाओगे ।४।