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लाडे गोरी वर सांवलौ, सीध व्याह संजोया । चौह चकि आण फीराय, लगन लिख्या घण सोच्या । घणां सोचि क जदि लगन लीखीया, दिन महुरत ठांणीयो । जगराय जग मंडण आप नीरंजण, कर आपो जाणीया । थारौ बोल कवल न टल ज्युग-ज्युग, भंवर भारथ मोहेला । जगत जागीद वीधाता, लाडे गोरी वर सांवलौ ।१।
ल्याइ आरतड़ा मंडप जगै जोती, वीर पचा धीड़ा । झबहि मिलै सुरनर गोती, मिलै गोती विसन जोती । मिलै गोती विसन जोती, सकल्य कल्यमां मोहेला । गुर व्रसपति वेद बाचै, तेतीस क घरि सोहिला । सतगुर ऐ वाहण चड़यौ झांभराय, साम्य संत बुलाइयां । चांद सुरेज राख मसो, आरतो ले आइया ।२।
सोह सहरड़ो श्री रंग, साच गुंथ मालण्य ल्याई । वाजीयड़ा पांच सबदां, मील्य करत बधाई । करत बधाई मति आई, पति संभु भेजीया । खलक माल्यक तजत बैठो, नव वेर दांणौ छेदीया । परमोध्य जप तप हुवा पुरा, ग्यान त्रभुवण मोहवे । तरण तारण छत्र मसत्यके, सेहरौ सीर सोहवै ।३।
साम्य काज वडेरवा, साह खुन्यवता । अबकै ल्यौह संमाहि, वारै कोड़ि न चीता । बारा कोड़ि न चीत कहीयै, रतन सांच ढालिया । संघण घण ज्यौ घोर बुठौ, वीसन जी के फेरवां । जुलफे कार ले चड़यौ दुल दुल, साम्य काज वडेरवां ।४।
इस साखी में प्रकृति और पुरूष के विवाह का गीत गाया है। प्रकृति यह पांच तत्व यानि आकाश, वायु, तेज, जल और धरणी तथा मन बुद्धि अहंकार ये आठों प्रकृति कहलाते है। प्रकृति की समता रूप से ही सृष्टि की रचना होती है। इस प्रकृति के ही तीन गुण- सतोगुण, रजोगुण तथा तमोगुण है। पुरूष परमात्मा और प्रकृति का सम्मिलन होने से ही उत्पति होती है। यह सांख्य दर्शन रचयिता कपिल मुनि का अभिमत है। यहां इस साखी में प्रतीक रूप में संसार में पति पत्नी को लिया है। वर-वधु जिस प्रकार से विवाहित होते है। मंगल गीत गाये जाते है। विवाह संस्कार मूहुर्त देखकर किया जाता है। हवन, यज्ञ किया जाता है। पण्डित वेद मंत्रों का उच्चारण करते है। प्रायः कन्या गोरे वर्ण की ही होती है। अर्थात् सात्विक शुद्ध सौम्य उसी प्रकार यहां पर भी प्रकृति को कन्या मानकर गौर वर्ण कहा है। वर कृष्ण वर्ण का कहा है। वैसा ही भगवान कृष्ण तथा विष्णु चित्र में प्रदर्शित किये है। प्रकृति पुरूष ही स्त्री पुरूष है वही दोनों ही साम्यावस्था ऋतुकाल में बालक का जन्म देने के कारण बनते है। उसी प्रकार से प्रकृति पुरूष से भी ऋतु आने पर पेड़ पौधे जीव जन्तु मानव आदि उत्पन्न होते है। यही विवाह है। इस कलयुग में प्रकृति में विकृति आना निश्चित है। यह प्रायः इस समय देखने को मिल रहा है। जिसे आज की भाषा में पर्यावरण का दुषित होना कहा जाता है। सभी लोग इस समस्या से चिंतित भी है और प्रदुषण को बढ़ाये भी जा रहे है। इस प्रकार का प्रदुषण फैलता रहेगा तो वह दिन दूर नहीं जब प्रकृति सभी कुछ देने से मना कर देगी। यह वसुधा कंपायमान हो जायेगी। इस धरती से मानव समाप्त हो जायेगा। ऐसा दिन शीघ्र ही कुछ वर्षों में देखने को मिल सकता है। ऐसी भयावह दशा में सभी मानव सृजित विकास नष्ट भ्रष्ट हो जायेगा तो पुनः भगवान ही दसवें अवतार कल्कि के रूप में आयेंगे और इस प्रदुषित उसर भूमि का पुनः उद्धार करेंगे। इस धरती को पुनः हरि-भरी खुशहाल करेंगे। इसलिये इस साखी में कहा है कि पुनः भगवान कल्कि इस कंवारी धरती से विवाह रचायेंगे और पुनः उत्पति प्रक्रिया प्रारम्भ करेंगे। जाम्भाणी साखियों में भविष्य के बारे में बहुत कुछ बताया है। आगे दसवां अवतार कल्कि होगा ऐसा अनेक बार वर्णन हुआ है। यह साखी भी उसी बात को दोहराती है। जाम्भाणी कवियों ने जाम्भोजी को अवतार रूप प्रगट किया है किन्तु नव अवतारों द्वारा जो कार्य नहीं हो सका था अर्थात् बारह करोड़ जीवों का उद्धार इसलिये जाम्भोजी का अवतार बतलाया है। बिश्नोई पंथ पर चलकर कलि के अन्त तक बारह करोड़ प्राणियों का उद्धार निश्चित किया है। इस समय आप और हम भी उसी पंथ के पथिक है अवश्य ही पन्थ को पकड़ें और अपने गन्तव्य स्थान तक पहुंच जायें।