मुंधे मुख दस मास, ओदर मांय रहयौ । प्यंड दुख पायो रे, दुख संगठ सहयौ । सहयौ संगठ ओदर असौ, चित हुं चिंता घनी । अवर अबकी बार कबहु, भग्यत्य साधौ हरि तनी । ओदरि आतर बोल बोल्या, बौह हरि जग्य जामन भयौ । संसार का जब पुवन लाग्या, मूढ़ सभ वीसरि गयौ ।१।
हे प्राणी ! गर्भवास में नीचे मुख तथा उपर पैर करके दस मास तक रहा था। उस समय शरीर से दुख पाया था। अनेकों संकटों को सहन किया था। गर्भ में अचेत अवस्था में रहा था। अपने परिजनों को चिंता रहती थी कि न जाने क्या होगा। गर्भ में कवल किया था कि अबकी बार जन्म लेते ही हरि की भक्ति में अपना जीवन लगा दूंगा। फिर से इस घोर अन्धकार नरक में नहीं आऊंगा। गर्भवास की पुकार हरि ने सुनी तब बालक का जन्म सुख पूर्वक हुआ। बाहर आते ही संसार की हवा लगी तब वहां की बात वहीं रह गई। मूढ़ सभी कुछ भूल गया। बालक अवस्था विकल बैचेन हो गया। सचेत होकर अपने आप को संभाल नहीं सका ।१।
बालक वैकल भयौ, चेत न संभाल्यौ । ना रहयौ अन्तर भाखी, राल मुखि बल चुयौ । पड़यौ लोट धरनी उपरि, रोय करि असथान पीयौ । मूत विष्टा रह्यौ बैठो, सुकरतन कीयौ कोयबो । भुलौ तुं भुदु भगति हरि की, बालापण्य यौ खोयबो ।२।
जैसी गर्भवास में अरदास की थी वैसी बाहर जन्म लेकर नहीं कर रहा सभी कुछ वहीं भूल गया। बाल्यावस्था के खेल ही खेल में सभी कुछ भूल गया। जब भूख लगती तो रो लेता माता पीने को दे देती। बालक अवस्था में किसी प्रकार की खाने-पीने, नहाने आदि की शुद्धता नहीं थी। शुद्धता अशुद्धता का अन्तर करने की क्षमता नहीं थी तब हरि भजन की क्षमता तो कैसे हो सकती है। इस प्रकार अज्ञानी रहकर हरि की भक्ति बाल्यावस्था में भूल ही गया ।२।
व्रथा जोबन वीसारीयौ, जो मद मातो चौह दिस फीरै । परधन पर त्रीया देख जोबन रे, मन रवै परधन देखि त्रीया । चीत ठोर नै राखिया, अमी तज्य करि पीव विष हरि । विषय विष सु राचीया, काम माया मोह माता । पार ब्रह्म वीसारीयां, काम माया मोह माता । ब्रथा जोबन वीसारीया ।३।
बाल्यावस्था के पश्चात् युवा अवस्था आ गई। जवानी की मस्ती में चहुं और मदमस्त होकर भटकने लगा। पराया धन और पर त्रिया देखकर उसकी प्राप्ति की कोशिश करने लगा। न्याय अन्याय, धर्म-अधर्म, नीति अनीति का कुछ भी ख्याल नहीं किया। दिन-रात विषय वासना में रत रहने से अपने आप के बारे में कुछ भी सोच नहीं सका। अमृत को छोड़कर विषय विष में रचपच गया। काम क्रोध माया मोह ममता के अन्दर उलझकर परब्रह्म परमात्मा को भूला दिया ।३।
भो सागर दुतर तरो, जुरा बुढ़ापा रे प्राणी आइया । सुध्य बुध्य वीसरी रे, तब पछताइया । पछताय जब सुध्य बुध्य वीसरी, श्रवन सबद नै बुझइ । जीव कारेण्य कर लालच, जीन जगत नै सुझई । भणै छीतम सुणौ रे नर, भरम भुला क्यों रहो । कीजै भाव सेती भगति हरि की, भौ सागर दुतर तीरौ ।४।
इस दुस्तर भवसागर से तिरने के लिये तैरना सीखना था वह तो नहीं सीखा किन्तु डूबने का मार्ग अपना लिया। इस जीवन के परिवर्तनशील होने से युवा से बुढ़ापा आ गया। सुध बुध चेता सभी कुछ भूल गया। बुढ़ापे में पराये वशीभूत होकर पड़ा रहा। अब कुछ भी नहीं हो सकता था। पीछे कुछ किया नहीं उसी के लिये पछतावा करने लगा। अब न तो आंखें देख रही है। और न ही कानों से शब्द श्रवण हो रहा है। इस जीव के कारण लालच किया था किन्तु वह धन संपति कुछ भी काम नहीं आयी। परिवार के लोगों ने उस पर कब्जा कर लिया। हे नर ! भ्रम में भूला हुआ क्यों घूमता रहा। इस जीव की भलाई के लिये हरि की भक्ति धर्म कर्म करना चाहिये था वह किया नहीं तो भवसागर से पार कैसे उतर सकेगा। यही जीवन की छोटी सी कहानी है। सभी के लिये लागू होती है। जानते भी है फिर भी समझते नहीं है यही आश्चर्य है।