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गुरु जम्भेश्वर भगवान
संग्रह48 / 156

साखी-48 (समसदीन)

अलमेरो मन खरौ उमाहीयड़ौ, साम्य मीलैण दिदारौ

कवि: समसदीन जी

कवि परिचय — समसदीन जी

विक्रम संवत् 1490-1550 में इन्होनें अपना जीवन यापन गुरु जाम्भोजी की शरण ग्रहण करके किया था। ये नागौर के मुसलमान थे। जाम्भोजी के दिव्य अलौकिक लीला देखकर शिष्य बन गये थे। उन्होनें अपने जीवन काल में दो साखियों की रचना की थी ये दोनों ही साखियां अच्छी मानी जाती है ये हजूरी कवि थे।

इस रचना का भावार्थ पंक्तिवार उपलब्ध नहीं है — पूरी रचना का भावार्थ नीचे दिया गया है।

अलमेरो मन खरौ उमाहीयड़ौ, साम्य मीलैण दिदारौ

हम विणजारीया ।टेक।

हम विणजारा पुर साह का, विणज करण वौपारौ ।२।

खोटा-खोटा विणज नै वोहरा, माण्यका दा वौहारौ ।३।

इह जुग्य पहल मोमिण, हुय चालो हंस यारो ।४।

इह जुगय दुज मोमिणौ, मत बसौ पड़िहारौ ।५।

इह जुग्य तीज मोमिणौ, जीवड़ा चेति संभालौ ।६।

इह जुग्य चौथ मोमिणौ, अब जीवड़ो की बारौ ।७।

पुरष पचा धो आवलौ, बाली परण हारो ।८।

मेघाडंबर छत्र धरा, दुल दुल होय असवारो ।९।

हाथि तिधारो खड़ग लीया, दाणवां करै सिंघारौ ।१०।

धरण्य तांबै की हुवली, ठंणकी बजावैण हारो ।११।

हंस रमै टोली रव, लंघीय भुयजल पारो ।१२।

पार गिराए वै गया, चूक आवण्य केरो ।१३।

अमी कचोला वै पीवै, सहजै सहज हींडायौ ।१४।

संमस पोत बोलीयो, कल्य दसव अवतारौ ।१५।

सर्व जगत के स्वामी आलम से मिलने की उमंग समसदीन कहते है कि मुझे हो रही है। हम तो व्यापारी है। यही सच्चा व्यापार करने आये है। हम तो व्यापारी सच्चे है सच्चाई धर्म का व्यापार कर रहे है। हम खरा सच्चा व्यापार करते है। खोटा झूठा व्यापार नहीं करते। 'माणिक पायो फेर लुकायो' ।सबद। हम तो हीरे माणिक्य का उतम वस्तु का व्यापार करते है जिससे उतम फल मुक्ति युक्ति प्राप्त कर सके। हे मोमिणों ! प्रथम युग सतयुग में जीव हंस रूप में विवेक से संसार सागर से पार उतर जाते थे। तीसरे युग में जीव ज्ञान विज्ञान से सचेत होकर अपना उद्धार कर लेता था। दूसरे युग में वैराग्य ज्ञान भक्ति से अपना कल्याण कर लेता था। अब कलयुग में इस जीव के उद्धार का मार्ग भी शुचि, दान, दया, जरणा युक्ति से होगा। यह सभी कुछ बताने हेतु संत रूप में विष्णु का अवतार जाम्भोजी के रूप में हो रहा है। इनसे पूर्व भी बुद्ध गोरख आदि दिव्य अलौकिक सद्गुरु के रूप में अवतार हुआ है। कलयुग के अन्त में कल्कि दसवां अवतार होगा। जब धरती पर पाप पंक छा जायेगा। चारों और अज्ञानान्धकार का साम्राज्य होगा कुछ भी पाप पुण्य कर्म सुकर्म दुष्कर्म दिखाई नहीं देगा। त्रयगुण, सत्व, रजो और तमोगुण वाला खड़ग हाथ में लेकर यथा युक्ति विनाश पालन तथा उत्पति कर्ता के रूप में कल्कि भगवान आयेंगे तभी यह धरती पुनः पाप से मुक्त होकर शुद्ध पवित्र ताम्र वर्ण की हो जायेगी। दानवों का विनाश होगा। परमहंस भक्त जन आनन्दित होकर रमण करेंगे। अवशिष्ट बचे हुए कलयुग के बारह करोड़ों में से सभी कलयुग के अन्त में पार उतर जायेंगे। सतयुग में भगवान विष्णु ने प्रहलाद को वचन दिया था। तेतीस करोड़ के उद्धार का वह चार युगों में पूर्ण हो जायेगा। भक्त जन प्रहलाद पंथी अमृत की प्राप्ति करेंगे। ऐसा समसदीन विनती करते हुए कहते है।