आग्यम जो अग्यान क्रत जुग रोप करे, सेंसकला सरबंगी । हरे के मोनीयरौ जी, रतन वीराणो लेर छिपो । मंछ फीरत न संगी, हरि के मोनीयरो । मंछ रूप संखासीर मारयौ, कीया उजाल वीराणौं । कोरंभ रूप मध कीचक मारयौ, वारा रूप मुरदाणो । नारिस्यंघ रूप हीरणाक हरक मीनीयर, आग्यम कृत जुग रोप करो ।१।
सर्वत्र व्यापक सहस्र कला से सम्पन्न अवतार धारी भगवान विष्णु सत्ययुग में धर्म की स्थापना की थी। हरि के प्रिय भक्तों हेतु अनेक अवतार धारण करते है जब संखासुर ने चौदह रत्न छुपा दिये थे जिस पर उनका कोई अधिकार नहीं था। दुनिया को अपने अधिकार से वंचित कर दिया था। तब भगवान ने मत्स्य अवतार धारण करके संखासुर दैत्य का विनाश किया था। समुद्रीय रत्न आदि सभी के लिये सुलभ कर दिये थे। भगवान ने कछुवे का रूप धारण करके मधु कीचक दैत्य का संघार किया था। ब्रह्माजी को वेद वापिस उपलब्ध करवाये थे। भगवान ने वाराह रूप धारण करके हीरणाक्ष को मारा था। जल में डूबी हुई धरती का पुनः उद्धार किया था। भगवान ने ही नृसिंह रूप धारण करके हिरण्यकशिपू को मारा था। इस प्रकार से सत्ययुग में आगम वेद ज्ञान की स्थापना की और अज्ञानता रूपी दैत्यों का संहार किया था। सतयुग में धर्म की स्थापना स्वामी नारायण विष्णु ने की थी ।१।
मैणायर मणी हार बनारस खेत जुड़े, सुरता सहज करो हरक मोनीयारो । जीव देखै हरिचंद वाट सही, कब घुल्य घुल्य मीलै पीयारौ हरके मुनियारो । मीलै पीयारो प्रीतम म्हारौ, प्रबस्य बंध्या खेवके । जीवड़ा के काजे करणी झागी, गुरु मुख्य ठाढ़े पंथ सीरे । बावन परसराम हेलमह राव, राम लछमण लंक जुड़े । सात कोड़ि जुग्य त्रेता पुंहती, यो र वनारस खेते जुड़े ।२।
वाराणसी की पवित्र भूमि को भगवान शंकर ने अपनी तपस्या योग से पवित्र किया था। वहां अनेकों ऋषियों तपस्वियों का सम्मेलन हुआ था। सहज रूप से सुरति निरति करके योगाभ्यास द्वारा दिव्य ज्ञान की प्राप्ति हुई थी और अब भी हो रही है। जहां पर सत्यवादी राजा हरिचंद अपने धर्म की रक्षा हेतु बिक गये थे और सत्य का मार्ग अपनाया तथा अन्य आने वाले लोगों को प्रेरणा प्रदान की थी। अपने जीव की भलाई तथा अन्य साधक जनों के लिये त्रेता में पंथ की स्थापना हरिचंद तारादे रोहितास ने की थी। गुरुमुखी शिरोमणी पंथ की स्थापना की थी। त्रेतायुग में ही बावन, परसराम, महाराजा, राम-लक्ष्मण आदि के रूप में अवतार धारण किया और राम लक्ष्मण लंका में रावण से जाकर युद्ध किया और असुरों का विनाश किया। सम्पूर्ण त्रेतायुग में सात करोड़ जन वैकुण्ठ पहुंचे थे। यह सभी कुछ भगवान विष्णु का ही प्रताप था जो इन आदरणीय राजा महाराजाओं के रूप में आकर अपने भक्तों को सचेत किया था ।२।
जीव करै अतीपति मन रली, जीवन सह दुख भारी । कई-कई सीक चहोड़ करे, कई-कई फिरै जुहारी हरि के मोनीयरो । फीरै जुहमी वड वौपारी, अपस जीव ले अंतर तरे । कन्हड़ होय करि गउव चराई, पहल गोवल्य खेल खीलो । बुध रूप खाफर खां मार्यो, कंस केस संग्राम कीयो । नव क्रोड़ी जुग दवापुर पुंहता, करै अतीपानो रलीए ।३।
द्वापर युग में जीव मनमानी करने लगे थे अपने सुपंथ को भूल चुके थे। बड़े-बड़े धर्म के धुरन्धर धर्म का व्यापार करने में अपनी ही मनमानी करने लगे थे। इसी अपने कुमार्ग से नरकों में जाने का मार्ग अपना लिया था। उसी समय ही कृष्ण रूप में भगवान विष्णु आये और बंसी बजाई, गऊ चराई, धरती छेदी, काली नाथ्यो, असुर मार किया बेगारी। सबद। नौ करोड़ द्वापर में धर्मराज युधिष्ठिर के साथ कृष्ण चरित्र से पार पहुंच गये थे ।३।
भैण्य त्रभुवण राव सही, कल्य दसवै अवतारौ हरि के मोनियरो । छोड़ो माया जाल सही, मन हीयड़ सोच विचार करे । कल्यमां सुरनर आप प्रगास्यौ, मोख मुगति समझाय करै । हरजी हरि परि लीव लेखो, बार कोड़ि संमाहया दई । कल्यमा काल्यंग कुं हरि विसमल करिसी, कल्य दसवै अवतारि सहि ।४।
कलयुग में बुद्ध रूप में अवतार धारण करके भगवान विष्णु ही गया जी में रहे, जो काफिर हो गये थे उन्हें आस्तिक बनाया। पंथ चलायो, मार्ग बताया, यज्ञ को दुषित करने वाले याज्ञिकों को परास्त किया। कलयुग में ही दसवां अवतार कलयुग के अन्त में आयेगा। किन्तु नौ अवतारों से कार्य पूर्ण नहीं हो सका अवशिष्ट कार्य को सम्पूर्ण करने हेतु 'शेष जंभराय आप अपरंपर, अवल दिन से कहिये' 'जाम्भा गोरख गुरु अपारा' अपार गुरु के रूप में गोरख एवं जाम्भा कलयुग के मध्य में आये है। किन्तु 'काजी मुल्ला पढ़िया पंडित निंदा करै गिंवारा, दोजख छोड़ भिस्त जे चाहो तो कहिया करो हमारा' ।सबद। बारह करोड़ प्राणियों का कलयुग में उद्धार हेतु बुद्ध, गोरख एवं जाम्भा आये है। कलयुग पूर्ण होते-होते यह कार्य सम्पन्न हो जायेगा। सतपंथ बता दिया है। भ्रम मिटा दिया है ।४। 'गुरु का सबद मानिलो तो लंघिबा भवजल पारूं' ।सबद।