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गुरु जम्भेश्वर भगवान
संग्रह46 / 156

साखी-46 (अज्ञात कवि)

सत्य सुपन्तर दीठड़ा, सखी मेरे मन्य उपज्यौ सतभाव

कवि: अज्ञात कवि

सत्य सुपन्तर दीठड़ा, सखी मेरे मन्य उपज्यौ सतभाव । जाणौ रीणजीड़ा विसन दले, तेहु भण्य-भण्य त्रभवण राव । रावो वां वस ही सूं आयौ, सुरनर लायो जोड़ करै । दुल-दुल घोड़ो खड़ग तिधारौ, मेघाडंबर छत्र सिरै । घर हरै घटा बिजली झीलोरा, चीणम चीण पइठो । कह दुलम दे सुण्य हो काल्यंग, सत सुपन्तर दीठो ।१।

हे सखी ! सत्य सुपात्र को देखकर मेरे मन में सत्य भाव प्रगट हुआ है। मैं ऐसा समझती हूं कि मानों विष्णु के उपासक साधना रूपी खेती करने हेतु, विष्णु की उपासना करने हेतु, मन से संग्राम करने के लिये उद्यत है। जहां हरि की भक्ति भजन संकीर्तन होता है वहां भगवान स्वयं ही भक्तों के वशीभूत होकर आ जाते है। उन भक्तों की रक्षा हेतु भगवान रणभूमि में सर्वोच्च सवारी के उपर सवार होकर आते है भक्तों को आने वाली विघ्न बाधाओं को दूर हटाते है। जब साधक ध्यान समाधि के केन्द्र में पहुंच जाते है तब वहां पर बिजलियां चमकती है, गर्जना होती है और अमृत की वर्षा होती है। शुन्य में प्रवेश हो जाने से उस दुर्लभ देश में प्रवेश करके सत्य का साक्षात्कार सहज ही में हो जाता है ।१।

उदीया परबत पोल्य ढही, साख्यत करौ सुवारी । नव वेर हारीयड़ो, कंवल सरे उत्पुत्य कहुं तुहारी । उति पुत्य कहुं तुहारी काल्यंग, राय विसन सूं बाद किसौ । च्यारय चक नव दीप नुवाया, लख चोवरासी जीव सीरयौ । जुरा मरण भौ भांज झांभराय, मेर चुकाव तांस सही । धर धुज असमांण थरहर, उदीया परबत पोल्य ढही ।२।

पर्वत सदृश ज्ञान की उत्पति हो जाती है तो पोल पाखण्ड सभी कुछ ढह पड़ता है। उस प्रत्यक्ष दृष्टा साधक के अतिरिक्त वहां कोई और साक्षी नहीं बन पाता है। हृदय कमल खिल जाता है। वहीं से आनन्द की उत्पति होती है। जिसकी अनुभूति साधक ध्यानावस्था में करता है। जैसा विष्णु कहते है वैसा ही करें उनसे वाद विवाद कैसे करोगे। जिस अवतार धारण कर्त्ता विष्णु ने चार चक नव दीप को कंपा दिया है। चौरासी लाख जीव योनियों का सृजन किया है। साधक के जरा मरण का भय विष्णु मिटा देते है। सांसारिक पदार्थों में मेर चुकावो और परमात्मा से मेर जोड़ो। धरती धूजेगी आसमान थरहर कंपायमान हो जायेगा उदीयमान पर्वत ढह पड़ेंगे अर्थात् विष्णु की एक नजर से असंभव का भी संभव हो जायेगा ।२।

घणहर गाजी पड़ो, वरस्य करे यो पाणी रहयौ । नीवाणै उन्हौ ठाढ़े यहो जोग मील्यौ, अंति तुटै खुरसांणी । अंति तुटै खुरसांणी सही सु, पोह विहूणी थाकी । अंति गरब गइ कल्य तोटा, मल बर हीने वाकी । कटक खंधीर जुड़ गढ़ दीलड़ी, लसकर हुइ आवाज । मतै घंण ओल्हरी आयौ, वरस्य करै घंण गाज्या ।३।

साधक साधना में बैठेगा तब दसवें द्वार में मधुर गंभीर गर्जना होती है और अमृत रूपी वर्षा होती है। जहां नाभि, कुण्डली निवाण है वहां ऊर्जा शक्ति रूकेगी और वह पाताल का पाणी आकास को चढ़ेगा। तब उस परमात्मा गुरु का दर्शन साक्षात्कार हो सकेगा। खुरसाण पत्थर जिस प्रकार से लोहे के जंग को काट देता है उसी प्रकार से पाप रूपी जंग जीव के मेल को साधना में अनुभूति काट देगी। काम, क्रोध, लोभ, मोह की सेना हमला करने के लिये पीछे से आयेगी। वह साधक को पथ भ्रष्ट कर देगी किन्तु सतगुरु परमात्मा जाम्भोजी सहायक होंगे तिधारा खड़ग लिये हुए साधक की रक्षा करेंगे। पीछे से आने वाली विघ्न बाधाओं को नष्ट तुम्हारी साधना करेगी ।३।

पारै गिराय हुवौ सुखी, अभखल तजौ पुंवारी । अह जुग्य चौथे पड्यौ, कल्य जीवड़ा की बारी । अमी कचोलड़ हींड हींडोलड़ा, पाट पटंबर भारी । चीर पटोलड़ा भोग वह वर नारी, भोगवता वर नारी सदासु । पुजी जीव जगाति सीरे, दसवंध दीनु हजरत्य लीखीयो । नीरमल हुव सुपात करो, मन्यसा सुवां सदारंग उपजै । छह रूति बारा मास सुखी । पांच सात नव खड़ी उडीकै, पार गिराय हुवौ मुखी ।४।

जब तक संसार तथा सांसारिक भोग्य पदार्थों में ही अटके रहोगे तो कभी सुखी नहीं हो सकते। पाखंड को छोड़ो सत्यमार्ग अपनाओ तभी होने वाली अमृत वर्षा से सींचित हो सकोगे। भोग विलास हेतु ही यह जीवन आदरणीय नहीं है। इससे आगे भी अभि बहुत कुछ है जिन्हें प्राप्त करना है। अपना जो कुछ भी है वह परमात्मा के समर्पण करो। वह उसी का ही है उसी के समर्पण करते हुए तुम्हें कष्ट नहीं होना चाहिये। समर्पण भाव से ही निर्मलता होगी। सुपात्र बनोगे। उसी सुपात्र में ज्ञान ठहरेगा। मानसिक शान्ति सदा बनी रहेगी। आपके लिये स्वर्ग में पहुंच चुके पांच सात और नव करोड़ प्रतीक्षा कर रहे है। यह पार पहुंचने का सुअवसर प्राप्त है इसे व्यर्थ में खोना नहीं। सचेत होकर जीवन यापन करो। सदा तुम्हारी रक्षा सम्भराथल स्वामी जम्भदेव जी करेंगे ।४।