साखी-45 (रायचन्द जी द्वारा रचित)
कांय सखी तेरो मेलड़ो वेस्य, कांय सखीरी आमैण दुमैणी
कवि: रायचन्द सुथार
कवि परिचय — रायचन्द सुथार
कवि रायचन्द सुथार - 23, जन्म 1525-1610 इनके बारे में जम्भसार में परिचय मिलता है। ये हजूरी कवि थे। जाम्भोजी के साथ में रहते थे। भजन गायन करते थे। इनके द्वारा रचित छः साखियां प्राप्त है। सभी महत्वपूर्ण एवं गेय है। प्रथम साखी यह जाम्भोलाव तालाब की है।
कांय सखी तेरो मेलड़ो वेस्य, कांय सखीरी आमैण दुमैणी । श्री रंग किसन वदेस, तास कारण्य सखी मैं दुमणी । दुमैणी सखी कीसन कारण्य, क्यूं रहौ अकेलिया । नीत खींव बीजल गीणौ तार, विरह करत दुहेलिया । उधौ संदेशा कहो हरि सूं, मोर विण्य सुनी वणी । बिछुड़े सीरी रंग मीले नांही, तास कारण्य दुमणी ।१।
बाल कृष्ण जब गोकुल से मथुरा में कंस को मारने के अक्रूर जी के साथ में रथ में बैठकर मथुरा को चले गये। वहां जाकर कंस को मारा अपने नाना उग्रसेन को राज तिलक दिया और अपने माता-पिता वसुदेव देवकी को जेल से छुड़ाया। सभी कार्य किये किन्तु वापिस बृज भूमि में लौटकर नहीं आये। अपना संदेशा देकर अपने मित्र उद्धव को जरूर भेजा। गोपियां ग्वाल बालों को धीरज देने के लिये किन्तु उद्धव भी असफल हो गया। यहां पर इस साखी में गोपियां उद्धव के संदेश को सुनकर अति दुखी होकर कृष्ण की याद में उद्धव को उलहाना दे रही है। एक सखी दूसरी सखी से पूछ रही है कि हे सखी ! तूं आज इतनी उदास, मैला वस्त्र पहने हुए किसके वियोग में दुखी हो रही है। वह सखी उतर देती हुई कहती है कि हे सखी ! मेरे प्राण प्यारे कन्हैया आज यहां नहीं है। विदेश में है। इस कारण मैं दुखी हूं। मैं कैसे उनके बिना अकेली रह सकती हूं। देख सखी इस वर्षा ऋतु में नित्य प्रति बिजलियां चमक रही है। गर्जना हो रही है इस डरावने मौसम में मैं उन प्यारे कृष्ण के बिना अकेली कैसे रह सकती हूं। उद्धव ने जब से आकर संदेशा दिया है तब से तो मैं उस मोरनी के जैसी हो गई हूं। बिना मोर के वन सूना हो गया है। बिछुड़े हुए श्री रंग कृष्ण मिले नहीं इसलिये मैं दुःखी हूं ।१।
सखी मोहि निस नै आव नींद, पीव-पीव करत पपीहड़ौ । श्री रंग किसन वदेस, क्यौं रस हारू सखी महीयड़ौ । हीयड़ौ सखी क्यौं संहारया, कीसन मधवन छाइयौ । आप सोव नहीं देह सोवण, कांम कंटक संताइयौ । आवौ श्री रंग ले चैलौ हम कुं, इधक नर सजीवड़ौ । दाधा उपरि लूंण लाव, पीव पीव करत पपीहड़ौ ।२।
हे सखी मुझे रात्रि में नींद नहीं आती है। क्योंकि यह पपीहा भी मेरे वियोग को पीव पीव करके जगा देता है। मेरे प्राण प्रिय कन्हैया विदेश में है तो बताओ सखी मैं दही बिलौना मक्खन निकालना किसके लिये करूं। तथा श्रृंगार भी किसके लिये? यह मेरा दुर्बल हृदय कैसे मान सकता है। जहां भी मधुवन में देखती हूं प्रकृति को देखती हूं तो सभी जगह कृष्ण ही दिखाई दे रहे है। यह मिलन की प्रबल इच्छा न तो आप सोती है और न ही मुझे सोने देती है। हे श्री रंग आप आ जाओ और मेरे को अपने साथ ले चलो। आप उद्धव आदि किसी संदेशवाहक को भेजें क्योंकि वे तो जले पर नमक छिड़कने का ही कार्य करेंगे ।२।
सखी मोहि रैण्य न आव नींद, पास्य नै देखूं चंचल कान्हवो । इण्य रंग्य कोई हुवौ नै होय, खेलत आव श्री रंग गीदवौ । गीदव खेलत कीसन आवै, देखि हीयड़ौ सीयलौ । बाझत दरसैण्य तरसै, वरण होइ पीवलौ । खड़ी मारण्य द्यो संदेसा, किसन कोय बताव ही । खड़ी डीणी बाझत दरसण्य, रैण नींद न आव ही ।३।
हे सखी ! मुझे रात्रि में नींद नहीं आती है जब भी कन्हैया का स्मरण करती हूं तो उनके पास न देखकर नींद उड़ जाती है। यह चंचल कन्हैया तो दुनिया में एक ही अपने जैसा हुआ है। जब भी मैं स्वप्न में देखती हूं तो गेंद खेलता हुआ मुझे दिखाई देता है। गेंद खेलते हुए जब भी मैं आते हुए देखती हूं तो मेरा हृदय ठंडा हो जाता है। जब मेरे नयनों से दूर चला जाता है तो नयन दर्शन हेतु तरस जाते है। मेरा रंग पीला पड़ जाता है। मैं मार्ग पर खड़ी होकर बटाऊ को संदेशा देती हूं। कोई ऐसा बटाऊ बीर होगा जो मेरी गति कृष्ण से जाकर बता दे। बिना नींद के खड़ी प्रतीक्षा करती हूं। मेरे नयनों में नींद नहीं आती ।३।
धीरज करि हे गुवाल्य, आव लौ किसन गुवालीयौ । गढ़ मुथरा कंसासुर दैत, छल बुध्य कन्हड़ कंस पछाड़ियौ । छल बुध्य कन्हड़ कंस टाल्यौ, हरि सखी वधाइयौ । कंस मारयाँ इछा पुगी, करौ सखी उछाहीयौ । कवि रायचंद हरि ध्याय लीजै, अंति चीत रही जीयो । हीवड़ सहारण कीसन मीलियौ, मुंध धीरज कीजियो ।४।
सखी कहती है हे ग्वालिन ! धैर्य धारण करो वह गुवालिया कन्हैया अवश्य ही आयेंगा। तुम्हें पता होना चाहिये कि मथुरा नगरी में दैत्य कंस वहां का आततायी राजा रहता है। उसे छल बल से कन्हैया ने पछाड़कर मार डाला है। इसलिये तो वहां अपने भाई बलराम जी के साथ गये है। हे सखी ! मथुरा में इस समय बधाइयां बांटी जा रही है। कंस को मार डाला है। मथुरा वृजवासियों की इच्छा पूरी हो चुकी है। हे सखी ! तुम हम भी बधाइयां बांटें उत्सव मनाएँ। कवि रायचंद कहते है कि हरि का ध्यान कीजिये। हे गोपियों ! हृदय में हरि को विराजमान करो। हृदय हरि सिंवरीलौ। तभी कन्हैया सदा तुम्हारे पास ही रहेगा। हरि का वास तो हृदय में ही स्थायी होता है वही ध्यान के द्वारा देखें। "हृदय जो हवेली मांही, रहो प्रभु रात दिन" 'साहब' हे भोली गोपियों ! हृदय के सहारे कृष्ण मिलेंगे। धैर्य धारण करें ।४। "दिल साबत कन्हैया नैड़ो"।