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गुरु जम्भेश्वर भगवान
संग्रह44 / 156

राग जतश्री साखी-44

मन मेरो सोदागर, विणजत नेहड़ा कीजै जी

कवि: रायचन्द सुथार

कवि परिचय — रायचन्द सुथार

कवि रायचन्द सुथार - 23, जन्म 1525-1610 इनके बारे में जम्भसार में परिचय मिलता है। ये हजूरी कवि थे। जाम्भोजी के साथ में रहते थे। भजन गायन करते थे। इनके द्वारा रचित छः साखियां प्राप्त है। सभी महत्वपूर्ण एवं गेय है। प्रथम साखी यह जाम्भोलाव तालाब की है।

मन मेरो सोदागर, विणजत नेहड़ा कीजै जी । जीण्य जीव पिंड संवारियो, रसना रसिवस्य जपीजै जी । जपौ रसना विसन बोह विध्य, जांते लंघीय पारीया । संसार या राता मदमाता, जां रतन जलम जहारिया । काया कफ रूधी आप न संभाल्य, फंद पड़या जम नेहड़ा । कह रायचंद तिस नांव तरीया, कीजै वीणजत नेहड़ा ।१।

मन मेरा विणजारला, तुं देखि आपा संल्यबे । आप अकेला आवीया, नाहि तुं संद नाल वे । नाहि तूं संद नाल पेराणी, चला आप अकेलवौ । सुरगे जाय तौ आप सुहेलौ, आप अगति दहेलवौ । जो आया सो रहता न कोई, सभ भइ वस्य कालवै । कह रायचंद संसार अनेहा, देखि आपा संभालवै ।२।

रायचंद कहते है कि यह मेरा मन सौदागर है जो व्यापार करके लाभ लेना चाहता है। प्रत्येक भाव को लाभ की दृष्टि से देखता है जिस परमात्मा ने इस जीव को शरीर में पालन पोषण करके बड़ा किया है। उसी विष्णु को रसना से नहीं जपता है। विष्णु के नाम का जप करें तभी संसार सागर से पार उतर सकता है संसार के रंग में ही रचा हुआ मदमस्त हो रहा है। यहां संसार में रत्न सदृश अमूल्य जीवन को कौड़ि बदले बेच रहा है। जब यह शरीर वृद्ध हो जायेगा इस शरीर में वात-पित-कफ अनेकों प्रकार की बीमारियां हावी हो जायेगी और यमदूत गल फंद लिये आ जायेंगे। रायचंद जी कहते है कि समय रहते ही विष्णु नाम स्मरण रूपी हीरों का व्यापार करें जिससे यमदूत नजदीक नहीं आये। हे मेरा व्यापारी मन ! तूं अपने नजदीक आयी हुई मृत्यु को क्यों नहीं देखता। आप अकेला ही आया है और अकेला ही वापिस जायेगा। तुम्हारे साथ जाने वाला कोई नहीं होगा। स्वर्ग भी चला जायेगा तो भी "ते तं भुक्त्वा स्वर्ग लोकं विशालम्, क्षीणे पुण्ये मृत्युलोकं विशंति" 'गीता'। स्वर्ग का सुख भोगने के पश्चात् वापिस आना होगा। जो भी यहां आया है वह स्थिर नहीं रह सका है काल के मुख में चला गया है। रायचंद जी कहते है कि यह संसार किसी से हेत प्यार करने वाला नहीं है जो आना-जाना यहां निरंतर रहता ही है ।२।

संसार भला मेरा जीव, जो कुछ चालै साथवे । आग्य बलत झुंपड़ मेरा जीव, सार चड़ सोह थावै । जो कुछय चाल साथ्य जीव का, रहंदा काम न आवही । नां कछु गन हाथ्य पंजीहा, उरहा कौन बुलावही । धरम नैम सत संजम हरि चीत, इतना आव अरथ्यवे । कह रायचंद संसार भलाह, जो कुछ चाल साथ्यवे ।३।

इस संसार में रहकर सुकृत करें यही साथ जायेगा। यहां संसार में तो लोग सोये हुए है। जब झुंपड़े में आग लग जाती है तब कूवा खोदना प्रारम्भ करते है। जब बुढ़ापा में मृत्यु की शय्या पर पहुंच जाते है तब उपाय करते है उससे कुछ होने वाला नहीं है। आग लगने से पूर्व ही कूवा खोद लेना चाहिये। जो कुछ भी सुकर्म पुण्य किया है वही साथ जायेगा। यह पुण्य कार्य युवा अवस्था में ही किया जा सकता है। बुढ़ापे में पराधीन हो जाने से कुछ भी नहीं हो सकेगा। वहां आगे अपने हाथ में कुछ नहीं होगा। वहां आपको आदर सहित कौन बुलावा देगा। इस जीवन से धर्म-नियम, सत्य, संयम, हरि-चित इत्यादि शुभ किया जायेगा वही साथ में चलेगा ।३।

जीण्य हरि सुं चीत लाया मेरा जीव, पापा नै लैहा भारवो । गुर अपणां अपणाय लेसो, आप लंघावै पारवै । आप भुंयजल पारे लंघावै, जे एक मन्य धीयाइयौ । पाप पुन्य दोय संग्य होयस्यै, बोहड़िन इस कुड़ि आवीयो । जांम वीणस वीणस जांम, एहा औ संसार वो । कह रायचंद तै हलका जायस्यै, पाप नै लैदा भारवे ।४।

जिसने भी हरि से चित लगाया है उसे पाप प्रभावित नहीं कर सकता। पाप का भार सिर पर चढ़कर नहीं बोलेगा। सतगुरु की शरण में जाने से अपने लोगों को अपना बना लेंगे और उन्हें संसार सागर से पार उतार देंगे। एक मन चित से ध्यान लगाने से गुरु संसार सागर से पार उतार देंगे। यहां से अन्तिम प्रस्थान करते समय पाप पुण्य ही साथ जायेंगे। पुण्य के प्रताप से फिर से यह जीव जन्म मरण के चक्कर में नहीं आयेगा। इस संसार में तो बारंबार जन्म-मरण का चक्कर चलता ही रहेगा। यह पाप कर्म का फल होगा। रायचंद जी कहते है कि वे पुण्य आत्मा पापों की गठड़ी को यहीं छोड़कर हलका होकर वापिस अपने स्थायी घर वैकुण्ठ धाम में पहुंचेंगे ।४।