कवि परिचय — रायचन्द सुथार
कवि रायचन्द सुथार - 23, जन्म 1525-1610 इनके बारे में जम्भसार में परिचय मिलता है। ये हजूरी कवि थे। जाम्भोजी के साथ में रहते थे। भजन गायन करते थे। इनके द्वारा रचित छः साखियां प्राप्त है। सभी महत्वपूर्ण एवं गेय है। प्रथम साखी यह जाम्भोलाव तालाब की है।
श्याम सिधारे चिलत कियो, पंनरासै अरू तिराणियो । गण गन्धर्व साथ चाल्या, परगट खेल पसारियो । परगट खेल म्हारे श्याम पसारयो, साथ चाल्या मोमणां । क्यूं रहूं तेरे बिना दर्शन, गोवल सूनो देव तुम विना । साथरी गुरु की वणी सम्भराथल, जहां हरि खेल पसारियो । तिराणवै सांध पूगी देव, देकर सीख सिधारियो ।१।
श्याम भगवान श्री जाम्भेश्वर जी यहां से पुनः अपने लोक को विक्रम संवत् १५९३ मिंगसर वदि नवमी को पधारे। उन्होनें अपने समय में अनेकों चरित्र दिखलाये। उनके साथ में उनके प्रिय भक्त जन मुनि जन साथ में ही चले गये। उन्होनें यहां आकर प्रत्यक्ष रूप से खेल रचा था वह खेल पूर्ण हो गया। मोमण भक्त जन साथ में ही खेल खेलते रहे और साथ ही चले गये। देवजी के बिना उनके संग साथी यहां कैसे रह सकते है। क्योंकि इस गोवलवास को सूना कर दिया। अब तो गुरु की साथरी सम्भराथल बन चुकी है। जिस भूमि पर स्वयं हरि ने खेल खेला था तिरानवे का संवत् आया था तभी देव ने सभी को उतम शिक्षा प्रदान करके लालासर पहुंचे थे। उतम मार्गशीर्ष के महिने में अपनी ज्योति श्री देव ने वापिस समेट ली थी ।१।
क्या गुण वरणूं देव तेरा, ज्ञाने हिन्दू तुरक चेताविया । ऊजड़ देही वसता किया, कथ कथ ज्ञान सुणावियो । कथ्यो ज्ञान म्हारे ब्रह्मज्ञानी, अबूझ कोई नहीं जीतियां । काजी कतेबा वेद ब्रह्मा, जुगत जोगी चेतियां । ज्ञान खड़गा जीत वसुधा, उर में न राखी मेर हो । जहां देखूं तहां तूंही, क्या गुण वरण करूं देव तेर हो ।२।
कवि कहता है कि हे देव ! तुम्हारे गुणों का मैं क्या वर्णन कर सकता हूं मेरे में इतनी शक्ति बुद्धि कहां है। आपने तो हिन्दू मुसलमान आदि सभी वर्गों को चेताया था। इस संसार के लोगों की दशा दयनीय थी जीवन नशा तथा व्यसनों से नष्ट हो रहा था। आपनें पुनः जीवन को बसाया, यानि जीवन की युक्ति बतलाई। शब्दवाणी रूपी ज्ञान कथकर के सुनाया। हमारे ब्रह्मज्ञानी ने ऐसा दिव्य ज्ञान सुनाया जिससे उनसे कोई जीत करके नहीं गया। किताब पढ़ने वाले काजी, वेद पढ़ने वाले पण्डित, योग करने वाले योगी सभी सचेत हुए। ज्ञान रूपी खड़ग द्वारा पृथ्वी पर फैले हुए पाखण्ड को जीता। सम्पूर्ण पृथ्वी के लोगों को बसाया फिर भी किसी से मेर नहीं की, अपना कार्य पूर्ण करके चले गये। जहां तक मेरी दृष्टि जाती है वहां तक हे देव ! आप ही आप दिखाई दे रहे हो, मैं आपके गुणों का वर्णन कैसे करूं ।२।
देव तुम चाल्या संसार मेल्या, कही कही हेले जाणियां । छूटी गुरु पीरी करणी तजी, मुखां कुभाषा ठाणियां । ठाणी कुभाषा दुनि मिलियां, थूलां सुं संग जोड़िया । देव थे कही सब बात छूटी, क्यों करि मिलसी किरोड़ियां । बाद अरू अहंकार बधियो, नांही दिसै साल्हियां । जप तप किरिया भक्ति छूटी, देव सब तुम संग चालियां ।३।
हे देव ! आप तो इस शरीर को त्यागकर चले गये। पीछे सांसारिक लोगों ने आपके बताये हुए नियम-धर्म छोड़ना प्रारम्भ कर दिये है। कहीं-कहीं ही आवाज लगाने या जगाने पर ही जागृत हो पाते है। गुरु की आज्ञा छूटती हुई नजर आ रही है। कर्त्तव्य कर्मों को छोड़ने के लिये लोग तैयार हो रहे है। (ऐसा कवि को आभास हो रहा है वह सच्चाई ही साखी के द्वारा कह रहे है) मुख से कुवचन बोलने लगे है। किसी को अच्छी बात कहते है तो कुभाषा बोलकर दुनिया के लोगों के साथ मिलकर वही प्राचीन परंपरा अपना रहे है। हे देव ! आपनें जो बात कही थी, मर्यादा बांधी थी वे सभी छूट रही है। यदि इस प्रकार छूटती चली गई तो फिर उन तेतीस करोड़ से मिलान कैसे हो सकेगा? जहां पर देखो वहीं पर ही वाद-विवाद एवं अहंकार बढ़ चुका है, कहीं पर भी साल्हिया-सज्जन पुरूष दिखाई नहीं दे रहे है। जप-तप-क्रिया एवं भक्ति भाव भी छूट गया है। वे तो तुम्हारे साथ ही चले गये है ।३।
थे जमाती देव रहम करो, जोति न खींचो आपणी । नफर बिगड़े स्वामी लाजै, बात घणी देव तुम तणी । बात घणी देव तुम तणी नै, मुक्ति तुम सूं पाइये । जीवत तिरिये अजर जरिये, रतन काया पहिरिये । सैतान झोलो परे परिहरो, हरि राह तेरो है खरो । कर जोड़ी रायचंद करै विणती, थेई जमाती देव रहम करो ।४।
हे देव ! आप तो हमारे जमात के इष्ट देव हो। अपनी ज्योति न खींचो, आपका शरीर भले ही न रहे किन्तु आप ज्योति स्वरूप से यहीं पर ही विद्यमान रहो। यदि आपके ही भक्तजन पुनः बिगड़ जायेंगे तो लज्जा तो आपको ही लगेगी। संसार में आपका ही अपमान होगा। हे देव ! बहुत सारी बातें आपके रहने से ही बन पायेगी। आपके रहने से ही मुक्ति प्राप्ति संभव है। आगे कवि जनता जनार्दन को सम्बोधित करते हुए कहते है कि अजर जरो और जीवत मरो इसी सिद्धान्त को अपनाकर रत्न काया को धारण करो। सैतान की संगति को छोड़ो और हरि का बताया हुआ मार्ग ही सत्य है। हाथ जोड़कर रायचंद जी विनती करते हुए कहते है कि हे देव ! आप ही इस जमात पर कृपा करो ताकि यह जमात सही सलामत मानव बनकर जीवन में युक्ति-मुक्ति प्राप्त कर सके। कवि ने यहां पर जाम्भोजी के अन्तर्धान होने के पश्चात् की स्थिति का वर्णन किया है ।४। यह साखी वील्होजी के आगमन से पूर्व में कही गई है।