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गुरु जम्भेश्वर भगवान
संग्रह52 / 156

साखी-52 (पदम द्वारा रचित)

घरि क्यों न आवौ प्रभु मेरे जादवां, तम विन्य नैन दुराने

कवि: पदम

घरि क्यों न आवौ प्रभु मेरे जादवां, तम विन्य नैन दुराने । घर तो हम कुं वन भया, तारे गीनत वीहाने । गीनू तारे रीन सारे, इधक अन न भाव ही । सुघन्य उभी माघ जोवा, मीदरी काग उडावही । उडि जाहे वायस लेह भोजन, वीलस्य सो मन्य भावही । पदम के प्रभु नंद नंदन, जादवां कदि आवही ।१।

उद्धव गोपी संवाद सभी कवियों ने अपनी कविता का विषय बनाया है। यहां पर भी पदम कवि ने गोपियों की विरह व्यथा इस साखी द्वारा इस प्रकार से प्रगट की है। हे प्रभु यादव कृष्ण ! आप हमारे घर पर क्यों नहीं आते। आपके देखे बिना ये अंखियां दुःखी हो रही है। हमारे घर अब घर नहीं रहे है उजड़कर वन हो गये है। अब हमारी दशा अत्यन्त दयनीय हो गई है। रात्रि में निंद्रा नहीं आती है। पूरी रात्रि तारे गिनते हुए व्यतीत की जाती है। आपके बिना अब भूख भी नहीं लगती है। हम एकान्त शून्य में एकटक दृष्टि से आपके आने का मार्ग देखती रहती है। हमारे घरों पर जब कौवा आकर बैठता है तो उसे उड़ा देती है और आपका संदेशा लाकर देने के लिये कहती है। हे कौवा ! उड़ जावो ! हमारे से अपना प्रिय भोजन ग्रहण करो। आपका विलास मेरे मन को अच्छा लगता है। पदम कहते है कि गोपियां कह रही है कि हमारे नंद नंदन प्यारे आने का समाचार कब कोई सुनायेगा ।१।

लेख चंदण के कारण, कुबज्या भइ पियारी । बहुरी मधुवन रम रहै, छोड़ी चित हमारी । चित हमारी उन छाड़ी, छाय मधवन छाइया । कंवण अवगण्य तजी उधौ, सो संदेसा नै आइया । जाय कहीयो किसन सेती, इधक गीन्य क बचाइया । रिख चंदण के कारण, कुबज्या भई पियारीया ।२।

हे नन्द नन्दन ! आप मथुरा में चले गये है, वहां पर चन्दन का लेप लगाने वाली कुबजा आप को बहुत प्यारी हो गई है। इसलिये आप वापिस मधुवन में लौटकर नहीं आये है। आपको हमारी चिंता बिल्कुल ही नहीं है। हमारी चिंता उन कन्हैया ने छोड़कर मधुवन में तो केवल अब आप यादगार रूप में ही रह गये है। हे उधो ! हमने कौनसा अवगुण किया था जिस कारण से हमें यहां पर छोड़ दिया है। ऐसा कोई संदेशा अब तक आया क्यों नहीं। हे उधो ! अब आप वापिस जाकर कन्हैया से हमारा संदेशा भी कह देना कि आगे कब तक आप इसी प्रकार से तड़पाते रहोगे। आपके दर्शनों से वंचित रखोगे। वहां केवल कुब्जा ने चंदन का लेप ही तो लगाया था इसी कारण से ही उनके वशीभूत हो गये ।२।

गोकल मधवन्य अंतर घना, वीच वह जमना वरणी । घरि क्यों न आवौ प्रभु मेरे कोकिला, तंमै विन्य झंप्या न जाय । जांहि झंप्या न जाय तुम विन्य, कहो किस विध्य आइयां । झंप लेके पड़ जमना, अहलै जलम गुमाइयां । वसुदेव सुत तुम डरो नाही, विरह वेदन्य अंत्य घणी । पदम के प्रभु नंद नंदन, वीच वहै जमना वरणी ।३।

हे उधव ! यहां हम गोकुल में रहती है और मथुरा में जाने के लिये बीच में काफी फैसला है। बीच में यमुना जी बहती है। आप ही हमारे घर पर वापिस लौटकर क्यों नहीं आ जाते। तुम्हारे बिना हमें चैन नहीं पड़ता। एक क्षण भी तुम्हारे बिना हम रह नहीं सकती। अब आप ही बताइये कि आप किस प्रकार विधि से हमारे यहां मधुवन में वापिस आ सकते है। हम तो कुछ भी जानती नहीं है। अब हम भी क्या कर सकती है। आपसे मिलने के लिये यमुना में छलांग लगाये तो डूब जायेंगी। यह जीवन ही व्यर्थ चला जायेगा। क्या तुम अपने पिता वसुदेव जी से डरते हो। ऐसा डरते हो तो हम कहती है कभी डरना नहीं वे तुम्हें यहां आने से रोकेंगे नहीं। यदि ऐसी बात हो तो हमारी वेदना उनसे कह सुनाना वे बड़े दयालु है। हमारी दशा समझते है। पदम कहते है कि प्रभु नंद नंदन गोपाल से मिलना नहीं हो रहा है बीच में यमुना बहती है ।३।

घरि क्यों न आवौ प्रभु मेरे कंवल तीन, औगण तजो हमारो । जो हम औगण लख कीया, तो गुणदास तुम्हारौ । गुणदास थारी नंद स्वामी, तुमै चातर मुथरा धनी । हम अधम जात्य अहीर गुजर, तम ज नागर बोह गुनी । बोह गुणी तुम नंद स्वामी, हम भइ कुं पीयारीया । पदम के प्रभु नंद नंदन, मीलौ वेग्य मुरारीया ।४।

हे कमल नयन ! आप हमारे घर क्यों नहीं आ रहे है। यदि हमने कुछ अवगुण किया है तो हम क्षमा मांग रही है। भूल जाइये। यदि हमने लाखों अवगुण, अपराध तुम्हारे प्रति किये है तो भी हम तुम्हारे दास है। हे मथुरा के स्वामी ! आप हमारे किये हुए अपराधों को क्षमा भी तो कर सकते है। हम तो अधम जात गुजर है। आप श्रेष्ठ नागर राजा हो बहुत गुणों के धनी हो। हो सकता है आप बहुगुणों के धनी हो हम नीच है। आपकी बराबरी करने में असमर्थ है इसलिये आप हमें छोड़कर चले गये हो। किन्तु याद रखो स्वामी अपने सेवक के अवगुणों की तरफ ध्यान नहीं देते। जबकि हम आपके तन-मन-धन से समर्पित हो चुकी है। पदम कहते है कि गोपियां प्रार्थना कर रही है कि हे नन्द नन्दन आप अतिशीघ्र आकर मिलो यही हमारी आशाएँ है पूर्ण करो ।४।