दिल चंगा मन्य चांदिया, चांदिणा ते मोमिण संसार जी । गुरु कायमा ।टेर।
हे गुरु कायम ! अर्थात् प्रत्यक्ष रूपेण उपस्थित हम आपसे विनती कर रहे है । दिल साफ सुथरा कपट रहित होगा तभी मन में ज्ञान प्रकाश हो सकेगा । जिसके मन में प्रकाश हुआ है वही सच्चा मोमण भक्त इस संसार में होगा ।१।
साहेब मेरा वांणीया, सहज करे वोपार जी ।२।
मेरा साहिब परमात्मा मेरा सेठ साहुकार है । वह तो सहज रूप से ही सम्पूर्ण सृष्टि का पालन पोषण करने वाला है ।२।
वीण डांडी विण्य पालड़ा, तोल्या सब संसार जी ।३।
उसके पास न तो किसी प्रकार की तराजू है और न ही नापने का कोई साधन है । वह तो सभी को यथा युक्ति उनके कर्म भाग्यानुसार बराबर देता है ।३।
मैं कुता तेरे नांव का, मोतियो मेरा नांव जी ।४।
गल हमार रासड़ी, जां खांच जां जांव जी ।५।
हे देव जी ! मैं तो आपका कुत्ता हूं । मोतीयो मेरा नाम है । मेरे गले में आपने रस्सी डाल रखी है । जहां आप खींचकर ले जायेंगे वहीं मैं बड़ी खुशी से चला जाऊंगा । मैं तो अपने मालिक का सेवक हूं । मालिक की आज्ञा ही मेरे शिरोधार्य है ।५।
किसका माई बाप है, किसका पख परवार जी ।६।
किसकी मंडप मेड़िया, किसका ए घर बार जी ।७।
सांई की मंडप मेड़ियां, अलख तणां घर बार जी ।८।
भुंयजल अथघ अद्यावणौं, किस विध उतरा पारी जी ।९।
इस संसार में कौन किसका है, माता-पिता, भाई-बहन, परिवार आदि केवल यहां इस लोक तक ही सीमित है । यहां से प्रस्थान करने पर कोई किसी का साथ देने वाला नहीं है । यहां से तो अकेले ही प्रस्थान करना होगा । "सुकृत साथ सगाई चालै" ।सबद। सुकृत पुण्य किया हुआ ही साथ चलेगा, यही गुरुदेव आपकी आज्ञा शिरोधार्य है । यह संसार बड़ा ही विकट है । इससे पार उतरना भी बहुत ही कठिन है । बिना आपकी शरण ग्रहण किये किस प्रकार से पार उतर सकते हैं ।९।
करे सुकरत की नांवड़ी, जिसे उतारो पारी जी ।१०।
बोल दीन सुंरंदी, अलप जीवण संसारय जी ।११।
यही उपाय गुरुदेव आपने बताया है कि सुकर्म की नाव बनाकर ही उस पर बैठकर संसार सागर से पार उतर सकता है । कवि सुंरंदी कहते है कि यह जीवन थोड़े समय के लिये ही मिला हुआ है । ध्यान रहे कभी भी जा सकता है, कहा भी है "बिजुली झबुकै मोती पोव है तो पोयले" । बस इतना ही क्षणिक जीवन है, इसी क्षणिक अवसर में यदि मोती पोना है तो पोयले, नहीं तो अन्धकार होना निश्चित है, सावधान रहे । "जुग जागो जुग जाग पिराणी, कांय जागंता सोवो" ।सबद। ।११।