साखी-128
कांय सखी तेरो मैलड़ो वेश, कांय सखी री आमण दूमणी
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कांय सखी तेरो मैलड़ो वेश, कांय सखी री आमण दूमणी
श्रीरंग कृष्ण विदेश, तां कारण सखी दूमणी
दुमणी सखी कृष्ण कारण, क्यों रहूं अकेलियां
नित खिंवै बीजल गिणो तारा, विरह करत दुहैलियां
ऊधो संदेशो कहो हरि सूं, मोर बिन सूनी बणी
बिछड़े श्रीरंग मिलै नाहिं, तास कारण दूमणी (१)
सखी मोहे निस न आवे नींद, पीव पीव करत पपीहड़ो
श्रीरंग कृष्ण विदेश, क्यों स हारूं सखी मैं हीवड़ो
हीवड़ो सखी क्यों स हारूं, कृष्ण मधुवन छाइयो
आप सोवै नहिं देय सोवण, काम कंटक सताइयो
आवो श्रीरंग ले चलो हमको, अधिक तरसे जीवड़ो
दाझां ऊपर लूण लावै, पीव पीव करत पपीहड़ो (२)
सखी मोहे रैण न आवै नींद, पास न चंचल कान्हवो
इण रंग कोई हुवो न होय, खेलत आवै श्रीरंग गेंदवो
गेंदव खेलत कृष्ण आवै, देख हीवड़ो सीयलो
बाजत दरशण नैन तरसै, वर्ण होई पीवलो
खड़ी मारग द्यों संदेश, कृष्ण कोई बतावही
पड़ी झीणी बाजत दरसण, रैण नींद न आवही (३)
धीरज करिये ग्वाला, आवैलो कृष्ण ग्वालियो
गढमथुरा कंसासुर रहत, छल बुद्धि कन्हड़ कंस पछाड़ियो
छल बुद्धि कन्हड़ कंस पछाड़ियो, सखी हरि बधाइयो
कंस मारियो इच्छा पूगी, करो सखी उछाइयो
कवि 'रायचंद' हरि धियाय लीजे, अति चित रहीजिए
हिवड़ो सहारण कृष्ण मिलियो, मोहे धीरज दीजिए (४)