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गुरु जम्भेश्वर भगवान
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साखी-129

विष्णु विष्णु बखाण, बलि बलि सारंग प्राणी

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विष्णु विष्णु बखाण, बलि बलि सारंग प्राणी

कलि मां केवल ज्ञान, कहे अकथ कहाणी

अकथ कहाणी सुर वाणी, साच श्रवणे सांभलो

सत शील संतोष संगह पाप सूं पासै टलो

प्रहलाद सूं परतीत साची, सुगुरु मारग जाणियो

भ्रम परहर जीव निभ्रम, विष्णु नांव बखाणियो (१)

कलि मां ब्रह्म ज्ञान, सुण सहज स्नानी

महा जड़ जीव अज्ञानी, किया ब्रह्म ज्ञानी

ब्रह्म ज्ञानी किया करता, करत कलजुग आणियां

अटल गुरु का बोल जुग जुग, जो है अमृत वाणियां

शब्द गुरु का मुक्ति मारग, सांभलो गुरु भाइयो

अवतार जंभ नरेश को, कलि मंझ प्रगट आइयो (२)

परगट खोल पसार, सर बैठो सांई

तेतीसां प्रतिपाल, क्रोड़ बारां के तांई

क्रोड़ बारां काज आयो, राज निर्मल निज थले

अहंकार वाद विरोध परहर, ज्ञान सावल सांभले

भाग परापति भाग आयो, पूर्व कोल चितारियो

क्रोड़ बारां काज सतगुरु, प्रगट खेल पसारियो (३)

कहर क्रोध चुकाय, गुरु निंद न होई

नर परगट निरहार, सुरां गुरु सोई

सुरां गुरु संसार आयो, पार पहुंचो भाइयो

विदकार मां उपकार दाता, रतन भवन बताइयो

जुग चौथे क्रोड़ बारां, अनंत क्रोड़ि उधारियो

साध संगत भक्ति हरि की, कहर क्रोध निवारियो (४)

दिया गुरु मोक्ष द्वार, संभलो गुरु भाई

जप तप भाव भगति, गुरु जुगति बताई

जुगति बताई मुक्ति दाता, मेल बैकुंठां मोमणां

अवतार सूं परतीत साची, रूप हरि का अति घणां

गरीब रूपी गुण निर्गुण, कह्यो गुरु को कीजिये

'सुरजन' जन की वीनती, मुक्ति मारग दीजिये (५)