मुख्य सामग्री पर जाएँ
गुरु जम्भेश्वर भगवान
संग्रह249 / 157
प्रचलित अप्रचलित अन्य साखी

साखी-74

काया तो मोमणो रतन सरीखी, पहरेलो मोमण कोई

इस रचना का भावार्थ उपलब्ध नहीं है।

काया तो मोमणो रतन सरीखी, पहरेलो मोमण कोई

सतगुरु तो मोमणो सहजे सहज मिलियो, पूर्व लिखिया सोई

पूर्व लिखियो कोड़ि बारां, जंभगुरु परचाविया

वरतै अनहद अवल क्रिया, दुरसि ज्ञान सुणाविया

मुक्ति खेती पार लाभै, कह्यो गुरु को कीजिये

जीवत मरिये अजर जरिये, रतन काया पहरिये (१)

सतगुरु तो मोमणो सीख देवेलो, सांभलियो मेरा भाई

कूड़ कपट जीवड़ानै भारी हुवेलो, पंथ मां करो ठगाई

करो ठगाई पिंड काचे, साच सिदक न जोय हो

हीये भीतर घड़ौ घाटी, कायँ बाहर धोय हो

कपट कर कर पिंड पोखो, अंत धरती मांहि रहे

दोष दुस्तर जीव सहसी, सीख दियां सतगुरु कहे (२)

कांय मोमणो थे साध कहाओ, करतब करो अधूरो

राजा हरिचंद तो कोड़ि ले तरियो, जिण कर्म कमायो पूरो

जिन्हां करतब कियो पूरो, सोई जुगे जुग ऊधरया

प्रहलाद हरिचंद पांच पांडू, सुरां सेती रल मिल्या

बांका माघ जोवो सिदक खोजो, कपट देख न राचियो

झूंठ बोल्या क्रिया ओछी, कायँ काया पोखो काचियो ( ३ )

माया तो मोमणो मेर करावै, लिछमी आथ बिड़ाणी

काचो पिंड जीवड़ै कै साथ न चालै, सुकरत संचो प्राणी

सुकरत संचो जीव प्राणी, जिण संग दूतर तिरे

चांद सूरज पवन पाणी, सीख सतगुरु आदरे

संसार सलीयर कवल कूड़ा, कलि काले कण लियो

गुरु वचने मेर छाडी, जिन्हां सुक्रत संचि लियो ( ४ )

सतगुरु सिंवरो मोमिणा एक मन धयावो, दीन कथो जांभाणो

गुरु के वचने निंव खिंव चालो, साच सही कर जाणो

साच सही कर जाण रे जीव, छाड़ो मन दुभांतियां

सुरां सेती मिल्या नांही, पंथ मांही भ्रांतियां

कपट मेल्हो सिदक जोवो, अजर जरो जीवत मरो

कह 'ऊदो' पार पहुंचो, सेवा सतगुरु की करो ( ५ )