साखी-73
हारे गुरुजी की कथनी जुलो मेरा बाबा, जहां का हरीया भाग
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हारे गुरुजी की कथनी जुलो मेरा बाबा, जहां का हरीया भाग
गढ़ बैंकुंठे अलख लड़ी, चढ़ै जोवे छै माघ
सदरंग कामण माघ जोवै, कद साध मोमण आवसी
नूर सतगुरु आसा पूरवै, रतन काया पायसी
आरतो ले मुंधा आवै, स्वर्ग बाजे दुन्दुही
अनन्त बधावा हुवै जां दिन, मंगल गावै मिल सही (१)
अलख लड़ी अरदास करै, मो पीव सूं कद मिले
थांरी तिहुं जुगे इकबीस कोड़ी पहुंची, हिंडै सहज हिंडोले
सहज हिंडोले तेरा साध हींडै, दुःख दरिद्र नां तहां
जुग चौथे विष्णु मेलो, इकबीस कोड़ि बारहां
बैकुंठ बेड़ो विष्णु ढोयो, सुचियार साधां लेवसी
पार गिरांय पहुंचाय स्वामी, वास निहचल देवसी (२)
पार गिरांय नित अजरांवर, गुरु साहिब सूं लव लावणा
मोमणाने मनसा भोजन, अमी कचोला पीवणा
अमी कचोला चीर पटोला, अखे खैणी वर कामणी
तेतीस गढ़ तेरा सदा निहचल, देव समरथ तूं धणी
झणकार नेवर जोत रतनां, कोड पायल पेखणां
दीदार आगै सभा तेरी, देव दई नित देखणां (३)
धन्य धन्य हो जीवड़ा का कायम राजा, जो म्हानै स्वर्ग मिलावै
सोइ दत देइ हो म्हारा कायम राजा, जो थांरी गति भावै
दत देइ दाता मुकति मनसा, रतन काया पार दे
देव स्वर्गे मिल्या मोमण, सुर सभा दीदार दे
अति पात अनेक अप्सरा, हेत बहुरंग भाव छै
तेतीस क्रोड़ि मिले जांन, वींद त्रिभुवन राव है (४)