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गुरु जम्भेश्वर भगवान
संग्रह129 / 156

लूर राग सोरठ-129

गिरधर गोकुल आव, गोपी संदेशो मोकल्यो

कवि: ऊदोजी अडिंग

कवि परिचय — ऊदोजी अडिंग

वि. सं. 1818-1933 के मध्य जीवित रहे है। समाज में तीन ऊदोजी नाम से कवि भक्त हुए है। प्रथम ऊदोजी तापस दूसरे ऊदौजी नैण तथा तीसरे ऊदोजी अड़िंग। इन्होनें अपने जीवन काल में प्रहलाद चरित्र, विष्णु चरित्र, कक्का छतीसी एवं फुटकर साखियां एवं प्रसिद्ध रचना "लूर" की थी। एक समय जोधपुर के गांवों में ऊदोजी भ्रमण कर रहे थे उस समय होली के दिन थे। ऊदोजी ने देखा कि स्त्रियां अश्लील गाने गाते हुए नृत्य कर रही थी। उस समय ऊदोजी ने उन्हें मना किया और कहा ऐसे गाने नहीं गाने चाहिये। तब उन महिलाओं ने कहा कि इन होली के दिनों में हमें क्या गाना चाहिये। स्वामीजी आप ही बतला दीजिये? तब उसी जगह पर बैठकर यह "लूर" ऊदोजी ने गाकर सुनाई और बोले यह कृष्ण गोपियों का गीत गाया करो। वही लूर यहां नीचे दी जा रही है। जो समाज में बहुत ही प्रसिद्ध है।

इस रचना का भावार्थ पंक्तिवार उपलब्ध नहीं है — पूरी रचना का भावार्थ नीचे दिया गया है।

गिरधर गोकुल आव, गोपी संदेशो मोकल्यो । मोहि दरसण रो चाव, प्रेम पियारा कांन जी ।१।

थारे माथे मुकुट सुढ़ाल, केसर तिलक जूं हद बण्यो । मोहन नैण विसाल, सुन्दर बदन सुहावणो ।२।

घुंघर वरणां केस, कानां में कुण्डल झलक रहै । ओही मनोहर भेस, म्हारे मन में रम रहयो ।३।

गल बैजंती माल, पीताम्बर कट काछनी । हाथ लकुटिया लाल, श्याम सलूणों सांवरो ।४।

गावै छतीसूं राग, गिरधर मूरली मोहवणी । मोह्या मोह्या सुरनर नाग, गोपी मोह्या गवालिया ।५।

वे दिन कान्ह चितार, महिड़ो मोपे मांगता । अब तुम गये विसार, मथुरा में महाराज बने ।६।

कुबज्या कंस की दास, भली बसाई भामणी । वां संग कियो निवास, सहस सहेल्या छोड़ के ।७।

थानै झुरै जसोदा माय, राधा पलक न बिसरै । ललता जीव ललचाय, दरसण कारण दूबली ।८।

थानै झुरै बिरज की नार, घर-घर झुरै गवालियां । गऊवां तिण तज्यो मुरार, बछड़ा छोड्यो चूंगणों ।९।

थारै माथै हरियो रूमाल, नखला मेंदी राचणी । आयो रे फागणिये रो मास, गोपी गीत सुहावणां ।१०।

ऊधो कहे कर जोड़, कांय बिसारी कान्हवां । म्हारी अरज सुणों रणछोड़, दरसण दया कर दीजिये ।११।

भगवान कृष्ण को जब अक्रूर अपने रथ पर चढ़ा कर गोकुल से मथुरा को ले गया था। वहां श्री कृष्ण ने कंस को मारा अपने माता पिता को बन्धन से छुड़ाया तथा अपने नाना को मथुरा के राज सिंहासन पर बैठाया किन्तु वापिस लौटकर गोकुल व्रजभूमि में नहीं गये। पीछे गोपियां ग्वाल बाल माता जसोदा अति दुखी हो रही थी। कृष्ण के वियोग में प्रतिपल प्रतीक्षा में व्यतीत करने लगी तथा विलाप करती हुई कह रही थी। हे गिरधर ! कृष्ण वापिस आ जाओ। हम सभी आपके दर्शन के लिये व्याकुल है। इस लूर में प्रथम तो कृष्ण की सुन्दरता का वर्णन है फिर वहां के गोप ग्वाल गऊवों बछड़ों के दुख का वर्णन किया गया है। इसमें कृष्ण को मीठा-मीठा उल्हाना भी दिया गया है। माता जसोदा की स्थिति तो बड़ी ही दयनीय बतलाई गई है। कृष्ण को व्यतीत हुए दिनों की भी याद दिलाई गई है। जिन दिनों में गोपियों से जसोदा से मांग-मांगकर मक्खन खाया करते थे। अब मथुरा जाकर महाराज बन चुके हो। परन्तु हमारे लिये तो वही श्याम सुन्दर कन्हैया ही हो। एक बार आकर अपना सुन्दर मुख अवश्य ही दिखा दो यही इस लूर का भाव है। शब्दार्थ स्पष्ट ही है।