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गुरु जम्भेश्वर भगवान
संग्रह130 / 156

साखी दोहा 130

सौ दिन हरि की भक्ति करे, एक दिन ध्यावै आण

कवि: ऊदोजी अडिंग

कवि परिचय — ऊदोजी अडिंग

वि. सं. 1818-1933 के मध्य जीवित रहे है। समाज में तीन ऊदोजी नाम से कवि भक्त हुए है। प्रथम ऊदोजी तापस दूसरे ऊदौजी नैण तथा तीसरे ऊदोजी अड़िंग। इन्होनें अपने जीवन काल में प्रहलाद चरित्र, विष्णु चरित्र, कक्का छतीसी एवं फुटकर साखियां एवं प्रसिद्ध रचना "लूर" की थी। एक समय जोधपुर के गांवों में ऊदोजी भ्रमण कर रहे थे उस समय होली के दिन थे। ऊदोजी ने देखा कि स्त्रियां अश्लील गाने गाते हुए नृत्य कर रही थी। उस समय ऊदोजी ने उन्हें मना किया और कहा ऐसे गाने नहीं गाने चाहिये। तब उन महिलाओं ने कहा कि इन होली के दिनों में हमें क्या गाना चाहिये। स्वामीजी आप ही बतला दीजिये? तब उसी जगह पर बैठकर यह "लूर" ऊदोजी ने गाकर सुनाई और बोले यह कृष्ण गोपियों का गीत गाया करो। वही लूर यहां नीचे दी जा रही है। जो समाज में बहुत ही प्रसिद्ध है।

इस रचना का भावार्थ पंक्तिवार उपलब्ध नहीं है — पूरी रचना का भावार्थ नीचे दिया गया है।

सौ दिन हरि की भक्ति करे, एक दिन ध्यावै आण । सो अपराधी जीव है, पड़ै चौरासी खाण ।१।

आन देव ने धोकता, गयो जमवारो हार । जूणी पावै पशु बैल की, ऊभो बिकै बाजार ।२।

एवाड़ै की खेजड़ी, चड़ी दुष्ट के हाथ । ना तुलसी तन ऊबरै, ना कोई घाते घात ।३।

पिरथवी का थाम्भा पड़या, लीवी लांप की ओट । जाम्भेश्वर को छोड़ के, दीवी मुसाणां धोक ।४।

मड़ी मुसाणां शीतला, पूजै कर कर कोड । जीव पड़ैला नारकी, जम कूटैला भोड ।५।

गोगो पूजै प्राणियां, भादरवै के मास । पकड़ भूजा जम कूटसी, धर्मराज के पास ।६।

पड़ा बंचावै भील सूं, ऊभा बालै तेल । जमराजा हंस बोलिया, दो दिन करले खेल ।७।

नेम धर्म सब छूट गया, दया गई सब उठ । जमो दरावै ठोठ सूं, गई हिये की फूट ।८।

ढाढ़ी डूमां नै दान दैवै, लैवे माजनो पाड़ । जूंणी पावै भूत की, ऊभो सुणावै राड़ ।९।

गऊवां रा गोवा रोकै, आडि छपावै बाड़ । बिश्नोइयां विष्णु भणो, और दीजै सब छाड़ ।१०।

जम्भगुरु हीरा विणजियां, कियो वैकुण्ठे वास । ऊदो बोलै विणती, मैं थारे चरणों का दास ।११।

इस साखी में कवि ने आन देवता जैसे गोगाजी भूत प्रेत जोगणी शीतला आदि की पूजा करना मात्र पाखण्ड बतलाया है तथा कुपात्र को दान देना निषेध किया है। परमेश्वर सभी के सहायक होते हुए भी क्षुद्र देवताओं का सहारा लेना तो डूबते हुए तिनके का सहारा लेना है। ये भूत प्रेत भोपा आदि न तो मरने देते है और न ढंग से जीने ही देते है। जिस प्रकार से भेड़ बकरी चराने वाले खेजड़ी के पते काट लेते है, न तो उस वृक्ष को पनपने देते और न ही पूरी तरह सूखने ही देते । वही दशा भूत प्रेतों के उपासकों की होती है। बिश्नोइयों को चेतावनी देते हुए कहा कि आप लोग विष्णु का जप करो। सतगुरु ने हीरों का व्यापार किया है, आप लोग हीरे छोड़कर क्यूं काच की तरफ भाग रहे है। इस जीवन को तो अपनी इच्छानुसार जी लो परन्तु आगामी आने वाला जीवन दुखमय हो जायेगा। दो दिन ही हंसने खेलने के है आगे तो अन्धेरी रात है।