कवि परिचय — ऊदोजी अडिंग
वि. सं. 1818-1933 के मध्य जीवित रहे है। समाज में तीन ऊदोजी नाम से कवि भक्त हुए है। प्रथम ऊदोजी तापस दूसरे ऊदौजी नैण तथा तीसरे ऊदोजी अड़िंग। इन्होनें अपने जीवन काल में प्रहलाद चरित्र, विष्णु चरित्र, कक्का छतीसी एवं फुटकर साखियां एवं प्रसिद्ध रचना "लूर" की थी। एक समय जोधपुर के गांवों में ऊदोजी भ्रमण कर रहे थे उस समय होली के दिन थे। ऊदोजी ने देखा कि स्त्रियां अश्लील गाने गाते हुए नृत्य कर रही थी। उस समय ऊदोजी ने उन्हें मना किया और कहा ऐसे गाने नहीं गाने चाहिये। तब उन महिलाओं ने कहा कि इन होली के दिनों में हमें क्या गाना चाहिये। स्वामीजी आप ही बतला दीजिये? तब उसी जगह पर बैठकर यह "लूर" ऊदोजी ने गाकर सुनाई और बोले यह कृष्ण गोपियों का गीत गाया करो। वही लूर यहां नीचे दी जा रही है। जो समाज में बहुत ही प्रसिद्ध है।
इस रचना का भावार्थ पंक्तिवार उपलब्ध नहीं है — पूरी रचना का भावार्थ नीचे दिया गया है।
मिनखा देही है अणमोली, भजन विना विरथा क्यूं खोवै ।
भजन करो गुरु जम्भेश्वर का, आवागवण का दुखड़ा खोवै ।
गर्भवास में कवल किया था, कवल पलट हरि विमुख होवै ।
बाल पणे बालक संग रमियो, जवान भयो माया बस होवै ।
चालीसां में तृष्णां जागी, मोह माया में पड़कर सोवै ।
बेटा पोता अर पड़ पोता, हस्ती घोड़ा बघी होवै ।
धन कर ऐस करे दुनिया में, मेरे बराबर कोई न होवै ।
गर्व गुमान करै मत प्राणी, गर्व कियो हिरणाकुश रोवै ।
गर्व किया लंकापति रावण, सीता हड़कर लंका खोवै ।
सच्चा पायक रामचन्द्र का, हनुमान बलिकारी होवै ।
तन में तीर्थ न्हाय त्रिवेणी, ज्ञान बिना मुक्ति नहीं होवै ।
ज्ञान नहीं बन के मृग ने, किस्तुरी बन बन में टोवै ।
अड़सठ तीरथ एक सुभ्यागत, मात पिता गुरु सेवा से होवै ।
दोय कर जोड़ ऊदो जन बोलै, आवागवण कदै नहीं होवै ।
जीवन के प्रत्येक पक्ष को छूती हुई यह साखी नाना विषयों को उजागर करती हुई प्रवाह गति से गायी जाती है मानव जीवन का लक्ष्य उच्च कोटि का होना चाहिये। लक्ष्य की प्राप्ति के लिये सदैव प्रयत्नशील रहना चाहिये। जिन्होनें जीवन में लापरवाही की है उनकी दुर्गति हुई है। अन्धकार मानव का शत्रु है। निरहंकारी होकर ही जीवन को उन्नत बनाया जा सकता है। यही इस साखी में विशेष रूप से संकेत किया है।