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गुरु जम्भेश्वर भगवान
संग्रह132 / 156

साखी-132

सहंस्र नाम संभाल, परभाते पूजा करो

कवि: ऊदोजी अडिंग

कवि परिचय — ऊदोजी अडिंग

वि. सं. 1818-1933 के मध्य जीवित रहे है। समाज में तीन ऊदोजी नाम से कवि भक्त हुए है। प्रथम ऊदोजी तापस दूसरे ऊदौजी नैण तथा तीसरे ऊदोजी अड़िंग। इन्होनें अपने जीवन काल में प्रहलाद चरित्र, विष्णु चरित्र, कक्का छतीसी एवं फुटकर साखियां एवं प्रसिद्ध रचना "लूर" की थी। एक समय जोधपुर के गांवों में ऊदोजी भ्रमण कर रहे थे उस समय होली के दिन थे। ऊदोजी ने देखा कि स्त्रियां अश्लील गाने गाते हुए नृत्य कर रही थी। उस समय ऊदोजी ने उन्हें मना किया और कहा ऐसे गाने नहीं गाने चाहिये। तब उन महिलाओं ने कहा कि इन होली के दिनों में हमें क्या गाना चाहिये। स्वामीजी आप ही बतला दीजिये? तब उसी जगह पर बैठकर यह "लूर" ऊदोजी ने गाकर सुनाई और बोले यह कृष्ण गोपियों का गीत गाया करो। वही लूर यहां नीचे दी जा रही है। जो समाज में बहुत ही प्रसिद्ध है।

इस रचना का भावार्थ पंक्तिवार उपलब्ध नहीं है — पूरी रचना का भावार्थ नीचे दिया गया है।

सहंस्र नाम संभाल, परभाते पूजा करो । आवागवण नै होय, जीव अभय ले उधरो । जीव अभय ले उधरो नै, सतगुरु करै सहाय । स्वर्ग तणों सांसो नहीं, जरा मरण मिट जाय । पाठ कर पूजो हरि नै, कटै जम को जाल । वेद व्यास कथिया जको, सहंस्र नाम संभाल । प्रभाते पूजा करो ।१।

भगवत गीता गाय, ग्रन्थ नहीं गीता समो । उर में चेत अजाण, लख चौरासी क्यों भवों । लख चौरासी क्यों भवो नै, गीता गुण कर याद । अर्जन पूछी हरि कही, सो संवाद संभाल । श्याम सदा साथ रहै नै, मन इच्छा फल पाय । पाप सब प्रलय हुवै नै, भगवत गीता गाय । ग्रन्थ नहीं गीता समो ।२।

भागवत पुरो पुराण, सुणिया ही सांसो मिटे । हुए अर्थ को लाभ, किया कर्म सब ही मिटै । किया कर्म सब ही मिटै नै, हुए अर्थ आधार । पारायण पूरी सुणी नै, परिछित पहुंतो पार । शास्त्र सुन आलस न कर, उरमें चेत अजाण । हरि उद्धव संवाद को नै, भागवत पुरो पुराण । सुणियां ही सांसो मिटै ।३।

शब्दां सरीखो सार, म्हारे सतगुरु आप सुणावियो । पर हर पाप विकार, जोति हुवै जित जाविये । जोति हुवै जित जाविये नै, लीजै शब्द उच्चार । शुद्ध मन होकर होम कीजै, हुवै मंगलाचार । पाप सब परलय करो नै, मुक्ति द्यो मुरार । श्री वायक संभाल प्राणी, शब्दां सरीखो सार । म्हारे सतगुरु आप सुणावियां ।४।

अज्ञात कवि द्वारा विरचित यह साखी है। इस साखी में कवि ने सर्व प्रथम सहस्र नाम अर्थात् भगवान विष्णु के हजार नाम वाले सहस्र नाम ग्रन्थ का पाठ श्रवण मनन करने का कहा है। इससे दुखों से छूटकर मुक्त हो जाओगे। इस प्रकार से प्रथम चरण में सहस्र नाम का महत्व बतलाया है। दूसर चरण में श्री मद् भगवत गीता का गायन श्रवण मनन करना बतलाया है। वह गीता जो भगवान कृष्ण ने अर्जुन को सुनायी थी। वह ऐसा दिव्य ग्रन्थ है जो जीवन की सभी उलझनों का समाधान प्रस्तुत करता है। गीता पापों को काट देती है। तीसरे चरण में भागवत महापुराण का महत्व बतलाया है तथा पुराण में भी हरि उद्धव का संवाद ही अधिक महत्वपूर्ण है जिनके सुनने से संशय कट जाता है। चौथे चरण में सतगुरु देव द्वारा उच्चारण किये हुए शब्दों का महत्व बतलाया है। सतगुरु ने हमें सभी वेदों शास्त्रों का सार शब्द रूप में बतला दिया है। शब्द उच्चारण स्वर से करें तथा जहां भी हवन की ज्योति हो वहां पर अवश्य ही जाना चाहिये और एक स्वर से शब्द उच्चारण करना चाहिये यह विधान बतलाया है। शुद्ध मन होकर जीव की भलाई के लिये हवन कीजिये इससे आनन्द मंगल होगा।