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गुरु जम्भेश्वर भगवान
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प्रचलित अप्रचलित अन्य साखी

साखी-124

गुरु कायमां । टेर।

इस रचना का भावार्थ उपलब्ध नहीं है।

गुरु कायमां । टेर।

दिल मां दया सेवियो साधो मोमणो, परदेसी संसारी।

सै देशीड़ा आगल हुवैला, सुक्रत लेह सिधारी।

सुक्रत सुरग सुहेलां हुइये, मन मां देख विचारी।

गरथ विहूंणा जिसा व्योपारी, क्रिया विहूंणां हारी।

सबल विहूंणा कोस न चाल्यो, घर है भुंयजल पारी।

दिन दिन आव घटै सांभल,मनवा ज्यों छका तिथो सारी।

खालक राजा लेखो मांगै, पूगी मौत हंकारी।

विष्णुजी की सेवा मनसा मेवा, मिलै अतीवर नारी।

विष्णु जपंता पाप न रहसी, पोह उतरि व्योपारी।

सुरां सूं मेलो कान्ह दिसावर, गोठि मिलो दीदारी।