साखी-123 छंदा की : राग आसावरी
मैं गुरु पेख्या री माय, सांई सतगुरु त्रिभुवन को राव री
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मैं गुरु पेख्या री माय, सांई सतगुरु त्रिभुवन को राव री
उनलिख दिया री मेरीमाय,सोई जाप जपूं अधिक उमाव री
अधिक उमाहो साध प्राणी, थूल अंत न पाइयो
गिगन मंडल लोक तीनों जिन बिन थंभ रहाइयो
गिरि मेर पर्वत पवन पाणी, चंद सूर जिण सिरजिया
जीव काजे विष्णु जपो, मेरी माय सतगुरु पेखिया (१)
यो है विणजारो री मेरी माय, विणज करण आये संसार
यो है सराफीड़ो री मेरी माय, चुण चुण मोती परखलै
लिया मोती विष्णु जोती, साच वाणी भावही
ब्रह्म ज्ञान धयान केवल, सकल सार लहावही
कलिकाल वेद अथर्वण, सहज पंथ चलावियो
संभराथल जोत जागी, जग विणजण आवियो (२)
केई केई निंद करे मेरी माय, वद दुनी गुरु साधां पायो
तिन बैकुंठां री मेरी माय, धजाक जीव सुअवसर लायो
लाख अवसर राय त्रिभुवन, चरित किया संसारिया
द्वीप द्वीप खंड खंड,आप अजा चारिया
निरहारी शब्द भेदी, दुःख में सुख में सरीखा
कर्म रेखा विष्णु भेट्यो, संसार निंदक विंदका (३)
यो है जीव लिया मेर जीव, वार हुई चित चेत सवेरा
उन रथ जोतिड़ा री माया, आया सरस धोरी लेणहारा
सरस धोरी लेणहार आयो, मच्छ कच्छ वाराह हुए
नरसिंह वामन परसराम, बोहड़ि प्रभ न पाइये
गोरख जांभा कान्ह, लिछमण प्रसिद्ध परलई
पांच सात नव क्रोड़ि बारां, वार बारां की हुई (४)