साखी-122
तरण तारण जंभराज आवियो, तेतीसां प्रलिपाल
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तरण तारण जंभराज आवियो, तेतीसां प्रलिपाल
बारां क्रोड़ि समाहिसी, दैतां को खैंकाल
दैतां को खैंकाल आयो, जंभसारे वारता
जगै जोति चांद सूरज, करै सैं बीं री आरता
तखत साईं रच्यो साचो, कण तत्त सबद सुणाविया
कलि काले कलजुगे, तरण तारण जंभराज आविया(१)
फिरी दुहाई राय विसंन की, गुण गंधर्व जाके मीत
चीणम चीण गढ मां कटकीयौ, तुम क्यों सोवो नचीत
तुम क्यों सोवो नचीत कालंग, सोहड़ सांवत है खड़या
भयाक भड़हड़ा परबत, पोल आमै ढह पड़या
प्रथम आगल रेख उपनो, श्याम सुरता कृष्ण की
छोडि पुरब नुंव्या पछम, हिरी दुहाई राय विसंन की (२)
कले कालंग जगाइयौ, गरब करो मन थोड़ो
दुलम संक न मानिया, दाल चरे कठघोड़ो
दाल चरि कठघोड़ आवे, सोहड़ सांवत है मिले
उस लंग गढ मां एक रावण, सुरां असुरां निरदले
लख रावण लख महरावण, कुंभकरण सा भाइया
उजीण नगरी हुई गहमह, कले कालंग जगाइया (३)
दुलदुल पाखर मेल्ह करे,आखरि देह लगाम
तिंह चड़ि आवे मंहमंद हंकीयो, महदी साह सलेम
महदी साह सलेम चड़ियो, जुलकेकार झंपए
असमाण धरती मेर परबत, लोक तीनौं कंपए
सजे गरुड़ वाहण चड़्यौ जंभराय, छपन क्रोड़ि जादव मिले
साध पुगी लीवे लेखो, मेल्ह पाखर दुलदुले (४)
अलख निरंजण मनसा यों धरे, नबें बेर कियो कबूल
श्रीहरि श्यामने ओलख्यो, दसवें फिर अभूल
दसवें फिर अभूल कालंग, खलक खालक धियाइयो
फुरमाण राय विसनं को, मोहे संभर वर पाइयो
संखचुर संति विधुंसै, खड़ग जुग जुग सिर धरि
नाचे नारद करेअखाड़ो,अलख निरंजन मनसा यूं धरि(५)