साखी-134
गुरु जंभेश्वर अवतार लियो, सब धर्मा करि निवासा
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गुरु जंभेश्वर अवतार लियो, सब धर्मा करि निवासा
जिण सप्त पताले थंभिया, थंभिया धरणी आकासा ।
चार चक परमोधिया, उजड़ शहर के बासा
कै भीगा कै कोरा रह्या, सब पाणी की आसा ।
खरा ले अर्थ लगाविया, काम न आवै खोटा
ते क्यों अर्थ चढाइये, वै नफा न जाणै तोटा ।
जीभ लपट दिल वायसिया, वै कारण किरिया खोटा
राह गुरु की मानै नांहि, वै फिरै कांधै का मोटा ।
राह गुरु की मानियो थे, गिणीयों विष्णु सगाई
जंवरे जीवड़ा जाणसी, या तेरा खपर रूंधैला आई ।
साखिण सैंण बहण न भाई, ना उत पिता न माई
भगवत लेखो मांगसी यां, क्रिया विण अपना नाई ।
नां कुछि कारण नां कुछि क्रिया, अहल्यो जनम गमाई
गुरु जंभेश्वर विष्णु ही, जिण स्वरगे बाट बताई ।
बाटे भूल्या पड़या उजाड़े, बसती कहूँ न पाई
बसती बाहरां इकबीसा, मिलै हमारे गुरु भाई ।
दुनियां रोले भोले पड़ी, आगै एकह थाई
कह 'रायचन्द' आपो परमोधो, क्यूं परचै दुनी सवाई ।