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गुरु जम्भेश्वर भगवान
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साखी-135

झड़ कर वूठो भाव करै, भगतां के ताई

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झड़ कर वूठो भाव करै, भगतां के ताई

भाग परापति भेट हुई, थल बैठो सांई

सधर गुरु संसार आयो, जोत जागी निजथले

शेतान भूत प्रेत परहरि, ज्ञान सांवल संभले

शब्द बूंद स्वाति वूठो, हुवा आनंद धर धरे

आज अमीया धार वूठो, जंभ वूठो झड़ करे (१)

जुग चौथे फेर करे, जुग जीव जगाया

नवखंड गुरु की खबर हुई, संभराथल आया

संभराथल प्रकाश कीयो, विष्णु नांव चितारियो

द्वीप जंबू भरत खंडे, प्रगट खेल पसारियो

स्नान दान धियान केवल, भाग पायो भाइयो

जुग चौथे मेर कीवी, धर जीव जगाइयो (२)

नवखंड जिंह की खबर हुई, शुद्ध खेती कीजै

अवसर गुरु से भेंट हुई, जुग लाहो लीजै

लाहो लीजे दया कीजे, और लोभ न लागिये

दान दे स्तुति कीजे, नांव निहचल लीजिये

निरहारी आप आयो, चारूं धर्म चलाइयो

नवखंड खेत किसान जिंह का, साच खेत कमाइयो (३)

शरण जिंह के पार लंघे, गुरु परगट आयो

क्षमा दया सत शील सही, जोग जुगत दृढायो

जोग दृढायो विष्णु आयो, भाग पायो भाइयो

प्रहलाद सूं हरि कवल कीयो, वाचा पालण आइयो

जोग जिन रो साच इल मां, ब्रह्म ज्ञान चितारियो

'सुरजन' जन की वीणती, शरणै पार उतारियो (४)