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गुरु जम्भेश्वर भगवान
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साखी-84

घर क्यों न आवो प्रभु मेरे जादवां, तुम बिन नैन दुराने

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घर क्यों न आवो प्रभु मेरे जादवां, तुम बिन नैन दुराने

घर तो हमकूं वन भया, तारे गिन रैण विहाने

गिनुं तारे रैन सारे, अधिक अन्न न भावही

सुगन ऊभी माघ जोवे, मंदिर काग उडावही

उड़ जा हे वायस लेह भोजन, विलास सों मन भावही

'पदम' के प्रभु नंद नंदन, जादवां कदि आवही (१)

लेप चन्दन कै कारणे, कुब्जा भई प्यारी

बहुरि मधुवन रम रहै, छोडी चिन्त हमारी

चिंत हमारी उन छोडी, छाय मधुवन छाइया

कवन अवगुण तजी ऊधो, सो संदेशा न आइया

जाय कहियो किसन सेती, अधिक गिनक वचाइयां

लेप चन्दण के कारणे, कुब्जा भई प्यारियां (२)

गोकुल मधुवन अन्तर घणो, बीच बहै जमुना वरणी

घर क्यों न आवै प्रभु कोकिला, तुम बिन झं“यो न जाय

नांहि झं“यो जाय तुम बिन, कहो किस विध आइये

झंफ ले के पूं जमुना, अहलो जनम गुमाइये

वसुदेव सूं तुम डरो नाहिं, विरह वेदन अति घणी

'पदम' के प्रभु नंद नंदन, बीच बहै जमना वरणी (३)

घर क्यों न आवै प्रभू मेरे कंवल नैन, औगुण तजो हमारे

जो हम औगुण लाख कीया, तो गुण दास तुम्हारे

गुण दास थांरा नंद स्वामी, तुम चातुर मथुरा धणी

हम अधम जात अहीर गूजर, तुम ज्यूं नागर बहु गुनी

बोह गुनी तुम नंद स्वामी, हम भई कुपियारियां

'पदम' के प्रभु नंद नंदन, मिलो वेग मुरारियां (४)