साखी-85
जुल चालो रे मेरा भाईड़ा, इण पंथड़ेले पियार
इस रचना का भावार्थ उपलब्ध नहीं है।
सवैया
नर चिते कुछ और दई कुछ और बनावै।
करणा मते जहां महल दई तहां धूल उड़ावै।।
होन करै धनवन्त दई दरिद्र लिख दीन्हों।
दई करै सो होय चित्त मनु कूड़ो कीन्हों।।
देव भरोसो राखिये नर चितै पूरो खरो।
वील्ह कहे विष्णु जपो, भाग्य लि यो देसी परो।।
जुल चालो रे मेरा भाईड़ा, इण पंथड़ेले पियार
जुग आयो जंभेश्वर राजा, कलि दशवैं अवतार
कलि दशवैं अवतार संभरथले, जास परापति पाइयो
गण नर गंधर्व सुर नर बेली, साच शब्द सुणाइयो
उत्तर दिखण पूर्व पिच्छम, बागड़ देश उधारे
सुर तेतीसां हुवै मेलावो, जुल चालो पंथ पियारे (१)
मोक्ष दिया जंभेश्वर राजा, विष्णु जपो मन साधो
मोह कहै मेरी आगल मनसा, हीवड़ै बंधण गाढो
हीवड़ै बंधण गाढो गहि करि, ओ मन रीधो ज्ञानो
गुरु अचंभो सुर नर बेली, हरि सूं जन्म निधानो
गर्भवास कवल कियो थो, विष्णु नांव जे कहिये
अै दोय कष्ट महादुःख भारी,मोक्ष मुक्ति धर जाइये (२)
बारांनै पहुंचाय सतगुरु, जंभ सही सूं वूठो
अलख चतुर गुण आसण बैठो, हंस बोलै मीठो
बोल मीठो थले बैठो, जम्बू द्वीप मंझारी
आप मुसाहब कवले रावल, आपै कृष्ण मुरारी
एकलवाई थल सिर आयो, बागड़ देश सुहावै
क्रोड़ इक्कीस बैकुण्ठ पहुंता, बारांनै पहुंचावै (३)
पारगिरांय बसेरा कहियो, नर निरहारी आयो
च्यार चहुं चक फिरी दुहाई, जद झबक जगायो
जद झबक जगायो मोमण, न्हाणो न्हाण करंता
एक मन एक चित करे बंदगी, कंवला ज्यों विगसंता
मुख मानुष अलियो मत भाखो, बोहड़ि न होई फेरो
जन्मों का पछतावा चूकै, द्यौ पारगिरांय बसेरो (४)