साखी-86
पहले मेलै की मांड हुई, सौलासौ अड़ताले
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पहले मेलै की मांड हुई, सौलासौ अड़ताले
तेरा धर्मी धर्म करै, तीर्थ कलों उजाले
उजलो तीर्थ कियो सतगुरु, पाप खंडन कारणैं
कुफर भंजे राह कीयो, काज भगतां तारणैं
साहेब गरीबी गुण विचारयो, विगति नांहि ज्यूं जई
चैत्र मासे पंख पहिले, मांड मेलै की हुई (१)
निज तीर्थ मेल हुई, भाव कियो भल सांई
मोमण माघ जुलै, भले जीवड़ा के तांई
जीव काजै काढ़ माटी, पाल पर परवाहिये
शब्द सतगुरु सांचिये, कण काज कंकर गाहिये
जपै जाप जंभ को, जुगत मिलवा सत्य थे
आस पियासा मिले मोमण, मेल हुई निज तीरथे (२)
एक दोवड़ दूज हड़ी, सुख मां सोर उपायो
न्हाठो चोर पकड़ लियो, भाखर जोर छडायो
जोर करि रजपूत रूता, चोर बांसै घातियो
धक्कम-धका पग न छाड़यो, सुरति मेलो साथियो
लिखे कारण जोग जुड़ियो, मरण आण मेलै दई
सुख मांहे दुःख ऊपनों, दूत हड़ी दोवड़ लई (३)
शोक बाजे सर बहै, बाजे धनुष कबाणां
हथियारे हाथ पड़े, भाखर और जांभाणां
हथियाराँ हाथे पड़िया, शूरमां गह मांडियो
हूब हुई हर मंडयो कंकल, कायरां पग छाडियो
गुरु सुगुरां सालि सूधा, सांकड़ै सूरां रहे
चोर काजे कल्है मांडी, शोक बाजे सर बहै (४)
भाखरसी क्यों ऊबरै, जिहिंनै लागो कालो
चुखनो उठ्ठो कोप करके, जाणै सिंघ पंचालो
पंचाल ज्यूं पड़ताल दैतो, पाधरो भाखर गयो
सिकर न होय तो सीस खेरे, तुरत भड़ पकड़ लियो
लिखे बिन क्यों लोह लागै, मरणै तै मत को डरै
चुखने की चोट आगे, भाखरो क्यों ऊबरै (५)
धने मांडी खरत खरी, बलवा मोहि खड़ाओ
गुरु आप मरणै कह्यो, बेगा वार न लाओ
वार न लाओ मेल्हि दावो, धने यूं कंध मांडियो
तुंवर बलव तेग बाही, कंवल धड़ कुटका कियो
रजपूत न्हाठा मिटयो भारत, रहियो तागो भलसरी
धने पूनीये कंध मांडियो, सत सीधो खेली खरी (६)
धना दान सुमान सरे, प्रभु मोटो सारियो
गुरु आपो मरण कहयो, गुरु मुख आपो मारियो
आपो तो मारियो प्रभु सारियो, संवत समय अरु चौसठै
चैत्र मासे पक्ष पहिले, लिखि कलम सो न घटै
चवदस के दिन धनो, कह 'वील्ह' विचारियो
मुक्ति दान सम्मान धियान, प्रभु मोटो सारियो (७)