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गुरु जम्भेश्वर भगवान
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साखी-87

पहले जुग मच्छ हुए, क्या क्या पोरस किया

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पहले जुग मच्छ हुए, क्या क्या पोरस किया

शशीयर सूर तपै, काछब हड़ि लिया

काछब लेग्यो पाताल नगरी, सिला घर दे घर छाइया

अमरीष दवारे रच्यो कोगति, मच्छ देखण आविया

पिलंग पोढण दे चहुको, भिड़कि दाणूं संघारिया

चांद सूरज दोय वेग आण्या, मच्छ संखासुर मारिया (१)

कोरंभ रूप करै, कियो काम सायर सेती

मेणा रम्भ मथ लिए, कर वासग नेती

नेती करि मनसा उपाई, रतन चवदह आणियां

कण राख बाकस दियो, ब्रह्मा कियो खारी पाणियां

गर्व करि मत मरो कोई, मद ह्यो नीच को

कोरंभ रूपी कृष्ण आयो, मारियो मधुकीचक को (२)

उर धर पोहम करै, हरि जग जस लियो

वसुधा फेर धरी, निज तीर्थ कियो

तीर्थ कियो देश दिखण, पोहमी पोह कियो ऊजलो

पुष्कर तीर्थ कियो प्रगट, अड़सठ में है सुजलो

तक तेग तरवर मोह माया, जप लीजै जल हरि

मार मुर दाणों राह कियो, सकल पृथ्वो ऊधरि (३)

आलम देश दुनि, सब देखण आए

पुरूष सहित नार, दिस दवादस लाए

लाय दवादस घेर सुर नर, विष्णु नांव न छोडई

तक तेग तरबर मोह माया, महर नहीं वहां लोक मांई

नरसिंह रूप हिरणाकुश मारियो, जो जड़ी के तालवे

क्रोड़ पांच सूं प्रहलाद सीधो,आलम दुनि जाण सबे (४)

बावन बल छलणो, वेद पुलंदर ल्याए

राय हकार लिए, विप्रां मन भाए

विप्रां मन भाए विष्णु आए, सति सतगुरु चीन्हियो

सकल पाकर जग हाथ डंडे, अंगुष्ठ पृथ्वी दीन्हियो

घोर घण ज्यों विष्णु बूठो, गज घटाले हरि खड़ो

पूठ मिण हरि पांव दीन्हो, बावनजी बलि यों छल्यो (५)

कामधेन हर लई, जमदगिन रैणका घाए

कोई अपराध भए, खड़ लसकर आए

खड़ लसकर कोट दिल्ली, व्रत ग्यारस निर्जला

टूक टूक संग्राम हूवा, सात कोड़ निरदल्या

पांच पांडु परसराम रूपी, देव दाणौं माख्या सई

देख तिण तां हुवो भारथ, कामधोन हर लई (६)

सायर मां वाट करे, राम लक्ष्मण आए

विभीषण आय मिले, रावण अणराए

अणराय रावण कुंभकर्णों, दुष्ट मन रावण थयो

बाल लंका दहवट कीवी, सीत ले हणवंत गयो

कोप लिछमण भंवर माख्यो, शीश पड़ै दश खड़हड़ै

जोड़ कपिदल राम ल्यायो, वाट सायर मां करै (७)

कान्ह खेलै गींदूड़, गोकुल मथुरा साई

जादम छप्पन क्रोड़ि, सोला सहंस उपाई

सोला सहंस उपाय गोपी, सेस वासग हारियो

नव नाथ गंधर्व मिलै, मुनियर राय वेग हकारियो

सहंस फण फूंकार मेलै, झाल विषवर छोडई

विष्णु दोषी भस्म हूवा, कान्ह गींदू खेलई (८)

कटक खंधार जुडै, खुरासाण सवाया

तेरा सुर तास हमेस है, सीझे सत भाया

सत भाया सीझे कवलभी, ठंभ रथ सूरज रह्यो

देखि बजतै वेग आयो, बुधा खापरखां हन्यो

काजी तो कलमां वेद ब्रह्मा, भणै भाट भठंतरै

नव क्रोड़ियां सूं जुध कियो, सुरासाण कटकी करै (९)

बारां क्रोड़ मिलै, गुरु के शब्द वहेला

कालंगो खेड़ कर, दाणौं देखि कटक गरबियो

देखि दुल दुल छींक आवै, चढै महमंद हनफियो,

महदीन शाह सलेम आवै, जोड़ि जंबू द्वीप कै

पांच सात नव खड़ी उडीकै,क्रोड़ि बारां क्रोड़ि कै (१०)