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गुरु जम्भेश्वर भगवान
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साखी-88

सावण साल्है श्याम बिना, दुःख अपार है

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बारैमासो-राग ललित

सावण साल्है श्याम बिना, दुःख अपार है

अब हम वे दिन वीचरी, नांव आधाार है,

आधाार दीजै निसा कीजै, आयेंगे नहीं रंग रंजियो

रैन अंधाारी देखी कारी, पीव बिना मंलर जियो

जल दादुरा बन मोर बोलै, पपीहो पीव पीव भिणै

करै रूकमण वीनती, सावण साल्हे श्याम बिणै (१)

भादूड़ै मांय मतियां, सीलता पूर है

सुन्दरि झुरवै रात दिन, सनेही दूर है

दूर सनेही विथा एही, हीयो करवत ज्यों बहे

चपल चित्त कूं बरज हारी, विरह वैरी ना रहे

पूर पावस इन्द बरसै, दोस नहीं को तिया

विनवत राधा वीनती, भादव मांय मतियां (२)

आसोज आतम आपणा, धीरज दीजिए

मन मां चिंता भौत है, नांव जपीजिए

नांव जपीजै हेत कीजै, विलंब न कीजे एक छिनां

आस लागी आव तूटै, जास नोपनै दिन दिनां

जोऊं ठाडी रैण वासरि, आय धीरज दीजिए

विनवै राधा वीनती, आसोज दरशन दीजिए (३)

काती कामण काहली, धीर ना धरो

सुण अबला की वीनती, कंथ कृपा करो

करो कृपा कंत आवो, बिण मिल्यां जीव ना रहे

लाख बधाई तांहे आपूं, किसन आवत जो कहे

रैण ठाढी कुढै कामण, पीव बिन नाहीं भली

करै गोपी वीनती, कातक कामण काहली (४)

सखी री मंगसर आवियो, मनवो न रहे

सूनी सेज सुहावै नहीं, विरह मन मां दहे

देह विरह बाज प्रीतम, कहो सखी क्या कीजिए

विरह वेदन धाय लागी, कहो कुण पर कीजिए

पान फूल श्रृंगार शोभा, मोहि कुछ न भावही

विनवै रूक्मण वीनती, इस विध मंगसर आवही (५)

पोह प्रीतम चाहिये, सनेही संधिया

विष वेदन विरह की, बीं सै धीरज बंधिया

धीरज बंधावे कोई सखी री, बाढ प्रीतम आपनां

मधुपुर गयो न आय मिलियो, दोस लावो बहुगुनां

चोवात चंदण कुंमकुंमा, आण अंग लगाइये

विनवत रूक्मण वीनती, पोह प्रीतम चाहिये (६)

माहे महल संवारिये, माधो आवै घरे

मदन उलटियो ना रहै, बस राखूं कुण परे

केम राखूं मन माधो, तुम तो रातै मधुपुरी

परदेसी प्रीतम नैन रहिया, आस लागी धनषरी

भवंग धाय पाताल पैठा, मन अंतर चित हित करे

विनवत रूक्मण वीनती, माहे माधो आवै घरे (७)

फागण फरहर वीनती, बाज श्रीरंग क्यो सहूं

करि दीपक सेज फिरूं, पीव बिन क्यों रहूं

कर दीपक देखी मेर, पीव चाहे सुंदरी

नव तन छीजै नैण भीजै, विरह वेदन मैं जरी

बिछरत दुःख अपार सखी री, कुण जाणै मन की

विनवै राधा वीनती, फागण फरहरै पवन की (८)

चैत चाहे कामणी, चतुरभुज आइये

निस वासरि नित चिंत, मधुवन जाइये

जांऊ। सखी री जहां मधुवन,जहां आदर पाइये

श्यामसुन्दर सकल मूरति, देखि तहां सुख पाइये

चात्रग मोर कहूके, वनराय मोरी घणी

विनवत विरहण वीनती, चैत चाहे कामणी (९)

बैसाखो मन मोरिया, बनी सुहावणी

जां का पिया परदेश है, मुख अटिया वणी

अटिया वणी बदन विलखै, हीयै धीरी न धरे

विरह कोकिल आय बोली, शब्द सुण विरहणी जरे

रुत बसंत प्रेम उपजै, केल कर कर कामणी

विनवै विरहण वीनती, वैसाखे सोहै वणी (१०)

जेठ जियारी जीव की, वेस जग जीवण मिले

कामण परेसाई सुलखणी, जिनां चित नाहीं चले

चित्त जिनां नाहिं चले सखी री, पति बिना सुख आपनै

जोय जोय पड़िया नैन झावां, दीस लाया बहुगुनै

बलि बलि निवैं उनमनी, प्यास लागी पीव की

विनवै राधा वीनती, जेठ जियारी जीव की (११)

आषाढे आशा न कीजिये, करण कमाइये

श्याम मिलन के कारण, अंग वणाइये

अंग वणावै मुक्ति पावै, हेत हर सूं लाइये

सैंस सोला करै आनंद, किसनजी घर आइये

आवों संतो चरण परसो, भाव भगति करीजिए

'लाल' जन की वीनती, प्रभु मोहि दरशन दीजिए (१२)