साखी-17
तेंतीसा प्रतिपाल, धरणीधर आयो धरां
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सवैया
जदि आवै महमाण, भाव करि आदर दीजै।
सरधा सरै सो अन्न प्रीतिपग पाहल लीजै।।
पलै बीझणै पूण थाल की माखी राखी।
साखी दीय संसार, चांद सूर दोई साखी।।
पाणी चलू बिसावणे, सली आखलें ने हूं।
भाव सरस नवधा भगति, उतिम लच्छण एहूं।।
तेंतीसा प्रतिपाल, धरणीधर आयो धरां
भवभंजन भूपाल, सतगुरुजी कृपा करो
सतगुरुजी कृपा करो नैं, अड़बड़िया आधार
बारां एक बीसा मिले, लंघे भवजल पार
भवभंजन भक्ति कीजै, कटे जम का जाल
जुग चोथे जोड़ी मिले, तेतीसां प्रतिपाल
धरणीधर आयो धरां ( १ )
सतजुग कोल संभाल, म्हारा श्याम सपीहर आवीयो
आवीयो आप अलेख, भगतां रै मन भावीयो
भगतां रै मन भावीयो नैं, गुरू भला बहोड़ा भेद
बाड़े हुंता बीछड़्या, उर होती घणी उमेद
होती घणी उमेद उर में, सतगुरु पावण भाल
पीव सोई पावीयो, सतगुरु कोल संभाल
म्हारो श्याम सपीहर आवीयो (२)
बाबे परच्या पात सुपात, परचा ब्राह्मण बाणियां
सोधया जीव सुजीव, सुमति दे सुमारग आणियां
सुमति दे सुमारग आणियां नैं, जे मनो मेल्ही भ्रांति
राजा रायक भाट भोजग, परच बैठा पांति
भ्रांति मेल्ही हुवा भाई, हुवा पात सुपात
जै गुरु ज्ञान पिछाणियां, परच्या पात सुपात
परचा ब्राह्मण बाणियां (३)
कोड़या रो तारणहार, वाचा पालण आपणी
पवण छतीसों पार, पहुंचाओ पूरा धणी
पहुंचाओ पूरा धणी नैं, पवण छतीसां पार
एकलवाई थल खड़्यो, भगवीं टोपी धार
कुल्ह वेद पुराण बखाण, बानो देव तूठो पार
अवतरो इण काम कलि मां, कोड़या रो तारणहार
वाचा पालण आपणी (४)
आशकरण अरदास, पारब्रह्म सुं दाखिये
प्रीति पहिले की पाल, पत बानें की राखिये
पत बानें को राखिये नैं, कृत जुग री काण
लेखो न लीजै दया कीजै, भेख आपणो जाण
सन्मुख न्हालो कोल पालो, सुणो श्याम सधीर
दास 'गोकुल' आस थांरी, सत जाणो गुरुधीर
पत बानें की राखियो (५)