साखी-18
मिलियो त्रिभुवण तार, जोति विराजे निज थले
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सवैया
भक्त मुक्त दातार, जंभ जगदीसुर कहियै।
थल सिर रह्यो जु आय, भाग बड़ै सू लहियै।।
ओलखियै आचार, पार कहो कूंण ज पावै।
सारां सनमुख रहै, दई नहीं पूठ दिखावै।।
ज्ञान कह्यौ गुर गम दई, म्हां सू सनमुख देव।
लूणकरण कर जोड़ कहै, किणिं हूँ न पायौ भेव।।
मिलियो त्रिभुवण तार, जोति विराजे निज थले
आवीयो आप अलेख, साच शब्द जुग संभले
शब्द साचा संभल्या, परतीत आई मोमणा
पंथ को झणकार बाजै, पाप छुटा अति धणा
आन भ्रम कुथान पूजा, तजे सकल विकार
आश गुरु की कीजिये, मिलियो त्रिभुवन तार
जोति विराजे निज थले (१)
वरतियो धनि धनिकार, धन्य मुहूरत धन्य घड़ी
झींणा शब्द झणकार, जोजन बाणी सुहावणी
जोजन बाणी सुहावणी, जे सकल धर्म निवास
हंस हिंहाली प्रगटयो, अधिक कीजे आश
काम क्रोध विकार परहर, पंथ चाल्यो सार
धर्म चौथे जुग संभल्यो, वरत्यो धनि धनिकार
धन्य मुहूरत धन्य घड़ी (२)
गुरु कथियो केवल ज्ञान, सुक्रत कर पहुंता निज घरां
सतगुरू कियो मिलाप पांच सात नव कोड़ बाहरां
पांच सात नव कोड़ बाहरां, मेलसी सुरलोय
बात साचे श्याम की थे, जपो एक मन होय
होम जाप समाधि पूजा, धरो शंभू को ध्यान
ब्रह्म क्रिया दाखवी, गुरु कथियो केवल ज्ञान
सुक्रत कर पहुंता निज घरां (३)
अवर न दूजो कोय, इण गुरु तणैं पटन्तरे
गुरु धारिया भेख अनेक, सकल दया सतगुरु करे
दया सतगुरु दाखवे, सहज शील संतोष
आश गुरु की कीजिये, जो देवे तूठो मोक्ष
बलि बलि विष्णु बखाणिये, तरण तारण सोय
श्याम साचो प्रगटयो, और न दूजो कोय
इण गुरु तणे पटन्तरे (४)
प्रगटयो कृष्ण मुरार, बेणै विष्णु बखाणियों
करसी गुरु पूर्ण वाच, शब्दे श्याम पिछाणियों
शब्दे श्याम पिछाणियों नैं, जे सुरां मेलण काज
'सुरजन' जन की वीणती, सदा राखो लाज
साध संगत भक्ति हरि की, सुपह सिरजणहार
सुगुरु जीवां तारसी, प्रगटयो कृष्ण मुरार
पूरो गुरु पार उतारसी (५)