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गुरु जम्भेश्वर भगवान
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प्रचलित छन्दा की साखी

साखी-16

राजा बलि के द्वार, जाचण आयो नरहरी

इस रचना का भावार्थ उपलब्ध नहीं है।

सवैया

अत्तरों थली सुमेर नाडो अर मानसरोवर

अत्तरो हंस अर काग अत्तरो तुरंगम अरखर

अत्तरो पायक पातसाह अत्तरो तारा अर शशीयर

अत्तरो आक र अंभ अत्तरो चन्दण लकड़धर

कांच कथीर कंचण हीर अह निश जिसो पटंतरो

ओर गुरां अर जम्भ गुरू, सूरे अंधेरे अंत्तरो

राजा बलि के द्वार, जाचण आयो नरहरी

बावन रूप मुरार, तीन पैंड वसुधा करी

तीन पैंड वसुधा करी नैं, लीनी देह बधार

भूप कह सुण देवता, मापो पीठ हमार

आया था हरि बलि छलन को, आप गए हरि हार

चार महीने तापसी, राजा बलि के द्वार

जाचण आयो नरहरि ( १ )

सहंसाअरजुन आय, कामधेन हड़ ले गयो

जमदग्नि रैणका मांय, दोनों ने दुःख दे गयो

दोनो नै दुःख दे गयो नैं, पुत्र हेत पुकार

कीवि माता रैणका, कान पड़ी भणकार

उठयो पुरूष धियान तज नैं, लीनो धनुष उठाय

एक बाण सों मारियो, सहंसाअरजुन आय

कामधेन हड़ ले गयो ( २ )

सोलह संहस्त्र चौक, रावण के घर स्त्री

राज गयो निरवंश, राम तणी सीता हड़ी

राम तणी सीता हड़ी नैं, आंण पहुंतो अंत

लंका तोड़ी कंध मरोड़ी, महाबली हनुमंत

इक लख पुत्र सवा लख नाती, रवि किरणां में हंस

पाट सिरै मंदोदरी, सोलह संहस चौक

रावण के घर स्त्री ( ३ )

परवाड़ा अनेक, कृष्णदेव किया घणां

महादुष्ट कंस एक, पकड़ पछाड़ियो आंगणां

पकड़ पछाड़यो आंगणा नैं, बला जे कारी बाल

टांग पकड़ अरू ठरड़ियो, अजहूँ कहै कंस खाल

उग्रसेन को राजतिलक दियो, रही भगतां की टेक

मथुरापुरी बधावणां, परवाड़ा अनेक

कृष्णदेव किया घणां ( ४ )

ऊंडो नीर अथाग, जुग सारे होतो सही

पगे पगे पगवाय, कलयुग कीवी गुरु जंभ हि

कलियुग कीवी गुरु जंभ हि नैं, पगे पगे पगवाय

अमृत जल से हेम भरी, हर कोई पीवण जाय

'हरजी' गरजी मुक्ति का, दर्शन दो सुरराय

जंभगुरु से वीणती, अबकै मोह मिलाय

पार उतारो देवजी ( ५ )