साखी-15
बाबो सांभलि जैसे बागड़ देश, पोहमी पीतांबर आवियो
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सवैया
अस्सी लख लील कबाण, दश लख लूंग सफेदी।
चावल पद्म पचास, घृत अपार अलेखि।।
अरब खरब मिष्ठान, एता विध बणाया।
सुर तेतीसां साथि, हरि ले जीमण आया।।
ऊगतड़ै प्रभात नै, हितकर बहोत होमाविया।
विसनं देव तिरपत भया, राजा बलि जीमाविया।।
बाबो सांभलि जैसे बागड़ देश, पोहमी पीतांबर आवियो
कांय पुरबले सै कर्मन रेख, रांक रतन धन पावियो
रांक पान रतन जड़ियो, ऐसी सुणीजै सोय
आप देव त्रिभुवन नायक, मिल्यो परगट होय
आलिंकारे ओलख्यो, गुरू गुदड़ियो सै भेस
संग साधो श्याम आयो, सांभलि जैसे बागड़ देश
पोहमी पीतांबर आवियो ( १ )
साधो चालो ज्यूं जोवण जाय, नैणे नारायण देखस्यां
उत मिलसी मुनियर पात, मांहि मधुसूदन पेखस्यां
पेखण कोड़ा तरण तारण, सुपह दाखणहार
मोमणो मन हर्ष हुवो, भेटस्यां दीदार
हीयो हर्सें मन विगसैं, संभल्यो हरि नाम
कीवी माया ज्यूं मोह छूटे, चालो ज्यूं जोवण जाय
नैणे नारायण देखस्यां ( २ )
भगतां पूगा पहिली सहनाण, देव जाणीजे त्रिभुवन धणी
यह अचंभी बात, जाटे जीकारो भण्यो
जाटे जीकारो भण्यो नैं, नर बोलता हूंकार
सुशब्द शील सन्तोष लेणा, पुरूष अथवा नारि
पालटी कुबधा कुबाणि मेल्ही, हुवा संत सुजाण
भाव सुं गुरु मिल्यो भगतां, पूगा पहिली सहनाण
देव जाणीजे त्रिभुवन धणी ( ३ )
देवां ही अति देव, शारंगधर संभरथले
जिन सतगुरु की सेव, कीजे मन सूधे मिले
मन सूधे सेव कीजे, हुवै मंगलाचार
पांच सात नव कोटी बारां, आयो तारणहार
आरती कीजे नाम लीजे, जीव काजे सेव
संभरथल परगट बाबो, देवा ही अति देव
शारंगधर संभरथले ( ४ )
मोमण मन मोटी आश, साचानै सतगुरु तारसी
देसी अमरापुर वास, आवागवण निवारसी
आवागवण निवारसी नैं, जे मन सूधे धयावियो
जीवत मूवा खाक हुआ, सै अमरापुर पावियो
शु गुरु की आण वरतै, ताण थंदे हारसी
वील्ह जपै आश थारी, सतगुरु कारज सारसी
साचानै सतगुरू तारसी ( ५ )