साखी-14
बाबे आप लियो अवतार, श्याम समराथल आवियो।
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सवैया
परहरिये सो गांव, नांव विष्णु को न भणीजे।
नहीं साध सूं गुष्ठ, ज्ञान श्रवणे न सुणीजे।
घणो वाद-अहंकार घणी पर निन्दा कीनै।
नहीं साध सूं प्रीत, मुख अब खल भाखिजै।
मेट्यो सतगुरू को कहयो, राह शैतानी पाकड़ी।
वील्हा विलंब न कीजिए जिण नगरी एकाघड़ी।
बाबे आप लियो अवतार, श्याम समराथल आवियो।
आवियो छे आप अलेख, भाग परापति पावियो।
भाग परापति पावियो ने जे मन त्यागी माण।
अन्हो अजाण अबूज मूरख, किया श्याम सुजाण।
कुमल कुलछण पर हरया, शुद्ध हुवा करणी सार।
भगवै बाने बिसनु आयो, आप लियो अवतार।
श्याम समराथल आवियो॥ १॥
धुर ओलख जै आचार, परमेश्वर पूरो धणी।
ठग पासीगर चोर, जीव दया पाले घणी।
जीव दया पाले घणी नै, हतै जीव न जाण।
मेघा देघां अहेड़िया घर पीजिये जल छांण।
बकर कसाई झींवरा ने, मुखा ज त्यागी मार।
मधम ते उत्तम किया, धुर ओलख जे आचार।
परमेश्वर पूरो धणी॥ २॥
मीर मुलक सुलतान, पीर पुरूष पाये पड़े।
पापां पड़े भगाण, गुरु भेटया पातक झड़े।
झड़े पातक सकल मनसां सही सिरजण हार।
आप स्वयंभू आवियो, गुरु तरण तारण हार।
सूत पुराण कुराण पर हर, करो विसनु बखाण।
पूण छतीसूं पाये लागे, मीर मुलक सुलतान।
पीर पुरूष पाये पड़े॥ ३॥
रायक आण्या राय, गुरु फरमाई सै करे।
बोले बचन विचार, मुख सुर बाणी ओचरे।
मुख सुर बाणी ओचरे ने, बोले वचन विचार।
फू ल पीतल झालरा ने नील तियागे नार।
हरि होम कीजे पाहल लीजे, परस लागे पाय।
कली काल संभाल, सतगुरु रायक आण्या राह।
गुरु फरमाई से करे॥ ४॥
म्हारी आवागवण निवार, इण टाणै सूं मत टालियो।
अब लीजो अपणाय, छाप पूरबली पालीयो।
छाप पूरबली पालियो ने, थे जंभ गुरु जगनाथ।
पांच सात नव करोड़ बारां दिया सतगुरु साथ।
हरि हेत कीजे दरस दीजै, पार घर पहुंचाय।
दास केशो आस थांरी,आवागवण निवार।
इण टाणै सूं मत टालियो॥ ५॥