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गुरु जम्भेश्वर भगवान
संग्रह119 / 156

साखी दोहे-119

देव तणी परमोध में, कसर्वै समो न कोय

कवि: हरजी वणियाल

कवि परिचय — हरजी वणियाल

हरजी वणियाल जन्म संवत् 1745-1835 मध्य अनुमानित है। ये जांगलू के वणियाल गोत्र के बिश्नोई गृहस्थ थे। ये दामोजी के शिष्य थे। ऐसी प्रसिद्धि है कि हरजी ने स्वयं एक पोथी लिखी थी। उसका आधार भी परमानन्द जी ने "पोथो ग्रन्थ ग्यान संग्रह" में लिया था। ये स्वयं ऐतिहासिक एवं पौराणिक कथाओं का आधार मानकर साखियों का सृजन करते थे। इनके द्वारा रचित साखियां वर्तमान काल में सर्वाधिक प्रचलित है। ये साखियां प्रायः जागरणों में गायी जाती है। हरजी ने जो भी रचना की है वह उच्चकोटि की काव्य रचना कही जा सकती है। नीचे उनके द्वारा रचित साखियों का भावार्थ किया जा रहा है।

देव तणी परमोध में, कसर्वै समो न कोय । सेंसो तो सारा सिरै, अरू स्वर्गा में होय ।१।

एक बार गुरु जाम्भेश्वरजी अपनी शिष्य मण्डली सहित भ्रमणार्थ प्रस्थान किया था। एक रात्रि जांगलू की साथरी में निवास करते हुए दूसरी रात्रि नाथुसर के पास झींझाले धोरे पर निवास किया था। वहीं प्रातःकाल नाथुसर का सैंसा भक्त जो कस्वां गोत्र का था वह भी अपने मित्र सम्बन्धियों सहित दर्शनार्थ झींझाले आया था। आगे साखी में बतलाया है- देव जाम्भोजी के दरबार में सैंसोजी आये थे। उनके जैसा अन्य भक्त और नहीं था। सैंसो तो शिरोमणि भक्त था। सैंसे की जाम्भोजी ने स्वयं भूरि-भूरि प्रशंसा भी की थी। यह भी कहा था कि यह भक्त निश्चित ही स्वर्ग का अधिकारी है ।१।

अरज करूं गुरुदेव जी, और न करसी कोय । म्हां समान कोई मानवी, जग मां देख्यो न लोय ।२।

गुरु के मुख से अपनी प्रशंसा सुनकर सैंसे ने भी यही कहा कि हे देव ! मैं आपसे विनती कर रहा हूं ऐसी विनती प्रार्थना जप अन्य कोई नहीं कर सकता। वास्तव में मेरे जैसा मानव और कोई नहीं होगा ।२।

सैंसो तो सतगुरु सूं कहै, मांगे सीख जमात । घर आया नै दीजिये, सुण सैंसा आ बात ।३।

सत्संग पूर्ण हुआ संध्या बेला हो गई सभी ने अपने अपने घरों को जाने की आज्ञा मांगी तथा सैंसे ने भी हाथ जोड़कर प्रार्थना करते हुए कहा कि हे देव! मुझे क्या आज्ञा है? गुरुदेव ने कहा कि घर आये हुए सुभ्यागत का आदर सत्कार करना यही तुम्हारे लिये आज्ञा है ।३।

जोखाणी जोखो घणों, सुण ले साची सीख । घर आया नै दीजिये, भाव भले सूं भीख ।४।

हे जोखाणी ! इसी बात की तुम्हारे घर पर कमी है। इसकी पूर्ति करना ही सच्ची शिक्षा है ।४।

बार बार म्हांसो कही, एक बात सौ बार । मेरे घर को जगत् गुरू, जाणें सब संसार ।५।

सैंसे ने कहा- हे देव! एक ही बात यह आप मुझे बार-बार क्यों कहते हो। मेरे घर को तो सम्पूर्ण संसार जानता है। मैं घर आये हुए सुभ्यागत का सत्कार तन मन धन से करता हूं ।५।

आंजस कर सैंसे कही, दइय न आई दाय । सतगुरू आप पधारिया, पत्री लई उठाय ।६।

यह बात सैंसे ने बड़े ही अहंकार से कही थी। देवजी को अच्छी नहीं लगी थी। ऐसी गर्व पूर्ण वार्ता कहकर सैंसा तो अपने घर चला गया। पीछे-पीछे श्रीदेवजी ने अपनी पत्री उठा ली और वेश बदल लिया और सहसा सैंसे के घर पर पहुंच गये ।६।

अवाज करी हरि आवंता, हाजर है सो लाव । सतगुरू उभा आंगणें, देखण आया भाव ।७।

घर में पहुंचते ही हरि ने भिक्षा के लिये उच्च स्वर से आवाज लगाई और कहा कि जो भी भोजन है वह लाकर देवें। ऐसा कहते हुए दरवाजे पर खड़े हो गये। सैंसा का भाव देख रहे थे अभी-अभी अपनी बड़ाई करके आया है, इसके अहंकार का खंडन करना चाहिये ।७।

नारी सारी आंगणें, बैठी जोड्या थाट । भीख न घातै भाव सूं, ऊभा जोवे बाट ।८।

घर की सभी छोटी-बड़ी महिलाऐं बैठी बातें कर रही थी। कोई भिक्षुक आया है, इस बात की उन्हें कुछ भी परवाह नहीं है। इसलिये भिक्षा नहीं दे रही है। देवजी खड़े हुए प्रतीक्षा कर रहे है ।८।

लैणायत ज्यूं क्यूं खड्यो, समझायो सौ बार । कह्यो न मानें श्यामियो, हैं तो बड़ो गिंवार ।९।

एक प्रधान नारी ने यह कहते हुए नाराजगी प्रगट की कि ऐसे खड़ा हुआ क्या देख रहा है मानों कर्जदार कोई कर्जा मांगने आया है। इसे कितनी बार समझाया है किन्तु यह मानता ही नहीं है। सैकड़ों बार इसे यहां से जानें के लिये कहा किन्तु यह बड़ा ही हठीला है मानता ही नहीं है न जानें यह कैसा स्वामी फकीर है। यह तो निपट मूर्ख गंवार मालूम पड़ता है ।९।

जर झाली ठमको दियो, नारी कियो जोर । भनाय चल्या घर आपणें, पत्री केरी कोर ।१०।

अन्त में जब वहां से नहीं हटे तब हार करके कड़सी-जरिये में बची खुची ठंडी बासी खिचड़ी लेकर आयी और उन्हें देने लगी किन्तु वह तो कड़सी के चिपट गई थी छूट नहीं रही थी। उसे छुटाने के लिये जोर से पत्री पर चोट मारी तब पत्री एक तरफ से खण्डित हो गई। इस प्रकार से खण्डित पत्री और बासी भोजन लेकर चल पड़े ।१०।

परभाते सैंसो आवियो, देव तणै दीवाण । सुण सैंसा सतगुरू कह, ऐ सहनाण पिछाण ।११।

चलते हुए यह सवाल भी किया कि रात्रि में सर्दी अधिक है इसलिये ओढ़ने के लिये वस्त्र भी दीजिये। इस सवाल को सुनकर एक फटा पुराना गूदड़ा पकड़ा दिया और वहां से रवाना कर दिया। दूसरे दिन प्रातः काल ही सैंसा अपनी मण्डली सहित वहां झींझाले पर पहुंच गया और वहीं पर दान की वार्ता चली तब सैंसे ने बड़े ही गर्व के साथ कहा कि मैं दान देता हूं। मेरे घर को सारा संसार जानता है। तब गुरुदेव ने सैंसे के घर पर टूटा हुआ पात्र एवं भिक्षा का अन्न दिखाया और कहा कि यही तेरे घर की भिक्षा एवं फटा मैला वस्त्र है। इसकी पहचान कर ले ।११।

एह पटतरा सांभलो, सैंसो गयो सरमाय । आंख भींच भूं में पड़यो, धरती में रहूं समाय ।१२।

ये दोनों वस्तुएं अपने ही घर की देखकर सैंसा शर्मिंदा हो गया। आंखें बन्द कर ली और भूमि पर उल्टे मूंह गिर पड़ा। विलाप करते हुए कहने लगा- इस समय यदि धरती फट जाती तो अन्दर समा जाता ।१२।

मूंधे मूंडै पड़ रहयो सांभल सकै न जोय । इण खूंदी खूंद किया घणां, अरज करो मत कोय ।१३।

सैंसा मूंधे मुंह पड़ा रहा सामनें भी नहीं देख सका। कहने लगा- यह सैंसा हत्यारा है ऐसी हत्याऐं न जानें मैनें कितनी की है। हे लोगों ! श्री देव जी से मुझे क्षमा करने के लिये प्रार्थना न करो। मैं प्रार्थना करने के तथा क्षमा करने के योग्य भी नहीं हूं ।१३।

साथरिया कह श्याम सूं, अरज सुणो सुरराय । जे थे छोड़ो हाथ सूं, जड़ा मूल सूं जाय ।१४।

फिर भी साथियों ने श्री देव से प्रार्थना करते हुए कहा कि हमारी अर्ज सुनो। यदि आपने इस समय सैंसे को नहीं सम्भाला तो यह जड़ मूल से ही समाप्त हो जायेगा। इसलिये इस दीन पर कृपा करो ।१४।

उठ सैंसा सतगुरू कहै, गर्व न करो लिंगार । जन हरजी ऐसे कहै, सांच बड़ो संसार ।१५।

तब गुरुदेव ने कहा सैंसा ! खड़े हो जाओ। किन्तु फिर कभी इस प्रकार का अहंकार नहीं करना। हरजी कहते है कि संसार में सत्य ही बड़ा है। इस प्रकार से सैंसे के अहंकार को मिटाया था। वह खण्डित भिक्षा पात्र अब भी जांगलू के मन्दिर में रखा हुआ है। इस समय भी गुरुदेव को भिक्षा के रूप में उस पात्र को घी से भरते है ।१५।