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उतर दिसा दोय मोमीण आया, घर पुछावै रूड़े साध को । ऊचौ मरवौ बारि बिजौरी जी, औ घर रूड़े साध को ।१।
पुछत पुछत साधु जण आया, हेत करि मिली सती आमैणी । मन्यसा भोजन इम्रत मेवा, प्रीत का पीलंग बीछाइया ।२।
कांय थार मावल्ययाइ कांय थार प्रीत्रयाइ, आज अंबेला पाहणा । नां म्हार पीतरेयाइ ना म्हार मावल्ययाइ, साध मोमीण आया पाहणां ।३।
लेह न पड़ोसण पांवरी हे पायल, म्हारी तो सासु आगल्य मत कह । थांहरी तो पायल थेइज पहरोजी, म्हारी तो अलवी बंहनड़ ना रह ।४।
लेह नै पाड़ोसैण्य हाथ रो मुंदड़ो, म्हारा तौ छंदा बैनड़ तो रह । थारो मुंदड़ो थेइज पहरो जी, म्हारी नीमाणी बैहनड़ न रह ।५।
लेह नै पाड़ोसण्य सीसरी हे चुंदड़ी, म्हारा तौ छंदा बैहनड़ छायले । थांहरी तो चुंदड़ी थेइज ओढ़ौ जी, म्हारी नीसरमी बैहनड़ नै रह ।६।
लेह न पाड़ोसण्य गल रो हेवाललो, म्हारी वड़ेरी आगल मत कहो । थांहरो वाल लो थेइज राखौ जी, म्हारी तजो अलवी बहैनड़ न रह ।७।
नै जाणौ चोर थानै जाणे साध था, तारा रै उगण्य दोय जंण मोकल्या । काला बलदां पुता वहल्य जुपाड़ो जी, घरा नी कालौ बहु आमैणी ।८।
आवेलो बेटो कड़ीया लीयो जी, नीबोवल गायौ सती आगली । नीबलो बेटो भूखो हुवो जी, खोखा खीरि धरती पड़या ।९।
आंबेलो बेटो तीसायो हुवोजी, सुका सर पांणी छल्या । माया हुति सातो कोयला हुइ जी, रीध्य सीध्य लेगी बहु आमैणी ।१०।
धोला बलदां पुता वहल्य जुपाड़ोजी, पाछी लेयावौ बहु आमैणी । धरती माता वेहारज दीन्ही जी, धरा समाणी सती आंमैणी ।११।
सुरगापुर मां हुई बधाई, सरग्य पहंती सती आंमैणी । जिसौ कमावै तिसो फल पावै, कुमाई लहै छै आपो आपणी ।१२।
अज्ञात कवि द्वारा रचित यह साखी है। इसमें किसी घर की बहु जो "अड़सठ तीर्थ एक सुभ्यागत घर आये नै आदरियो" की उक्ति को चरितार्थ कर रही है। उतर दिशा से दो भगवान के भक्त भ्रमण करते हुए किसी गांव में पहुंचे थे। वहां पर सूर्य अस्त हो जाने से रात्रि विश्राम करने के लिये किसी भगवान के प्यारे भक्त का घर पूछा था। किसी पड़ोसी ने भक्त का घर बताते हुए कहा कि जिस घर में ऊंचा मकान दिखाई देता है कमरों की खिड़कियां और मरवों आदि का पेड़ पौधे दिखाते हुए कहा कि वहीं चले जाओ ।१। इस प्रकार पूछते हुए साधु जनों ने उस घर में प्रवेश किया तो आगे घर की लक्ष्मी बहु थी उन्होनें आये हुए सुभ्यागतों का आदर सत्कार किया और प्रेम से "आओ जी बैठो पीयो पाणी" द्वारा स्वागत किया। बैठने के लिये प्रेम से पलंग बिछाया और मनसा भोजन बनाया तथा उनको प्रेम से भोजन कराया ।२। घर में आये हुए अतिथि को देखकर पड़ोसण दौड़ी-दौड़ी आयी और पूछने लगी कि ये तुम्हारे घर पर कौन आये है क्या तुम्हारे पीहर से आये है या नाना दादा के यहां से आये है। तुम्हारे ये मेहमान पाहुंणो क्या लगते है जो इनकी इतनी सेवा कर रही है। उस घर की लक्ष्मी बहु ने कहा कि ये तो हमारे घर पर साधु भक्त आये है। जाभोजी ने कहा कि 'जां जां आव नै वेसूं, तां तां सुरग नै जैसूं' घर में आये हुए सुभ्यागत का आदर करने के लिये कहा है वही मैं कर रही हूं। हे बहन ! यह बात मेरी सासू से नहीं कहना क्योंकि सासूजी को ऐसे संस्कार नहीं है वे नाराज होगी। हे बहन ! यह बात सासू से नहीं कहना यदि इनके बदले में यदि तूं कहे तो मैं अपने पैरों की पायल तुम्हें दे सकती हूं। वह पड़ोसण कहने लगी तुम्हारी पायल तो बहन तूं ही पहनो। यह मेरी अनाड़ी जीभ बिना कहे तो नहीं रह सकती। फिर वह कहने लगी हे बहन ! यह मेरे हाथ की मूंदड़ी-अंगुठी ले ले मेरी सासू को नहीं कहना। पड़ोसण कहने लगी यह तुम्हारे हाथ की अंगुठी तूं ही पहनो यह मेरी नीमाड़ी जीभ बिना कहे तो नहीं रह सकती। फिर कहने लगी हे बहन ! यह मेरे सिर की चुनरी ले लो। किन्तु सासू से मत कहना। पड़ोसण बोली हे बहन यह सिर की चुंदड़ी तुम ही ओढ़ो यह मेरी निशरमी जीभ बिना कहे तो नहीं रह सकती। हे पड़ोसण बहन ! यह मेरे गले का हार ले लो किन्तु सासू से नहीं कहना। पड़ोसण कहने लगी यह गले का हार तुम ही पहनो यह मेरी दुष्ट जिभ्या बोले बिना नहीं रह सकती। मैं यह नहीं जानती कि ये दोनों रात्रि के तारा दिखने के समय प्रवेश किया था जो चोर है या साधु है। यह बात छुपाये छुप नहीं सकती। उसी समय सासूजी घर आ गई और कहने लगी कि इस बहू को काले बैलों की गाड़ी जोड़कर उन पर बिठाकर घर से बाहर निकाला जाये। यह बहू इस प्रकार से तो घर को बर्बाद कर देगी। मां का बेटा उस बहू का पति खेत से घास लकड़ी आदि लेकर आ रहा था। सती के पुण्य से घर आते हुए भूख लगी तब खेजड़ियों के खोखा गिरकर धरती पर गिर पड़े और उनसे भूख मिटाई। जब प्यास लगी तब सूखे तालाब भी पानी से भर गये स्वच्छ जलपान किया। सती बहु घर से बाहर जहां पर भी जा रही थी वहीं पर सूखी खेती हरीभरी हो रही थी किन्तु घर में पड़ी हुई माया-धन जलकर कोयला हो गया। घर से पुण्य बाहर चला गया था पाप ने घर में पसारा किया था जिससे सभी कुछ जलकर भष्म हो गया था। इसलिये कहा है कि पुण्य को घर में पांगला करके रखो कहीं घर से बाहर न निकल जाये। यह सभी कुछ देखकर सासू ने कहा कि यह बहु तो हमारे घर की लक्ष्मी थी इसे सफेद बैलों की गाड़ी जोड़कर उस पर बिठाकर वापिस आदर सहित बुला लाओ। इसने मेरी आंखें खोल दी है। किन्तु वह सती बहु वहीं वन में ही धरती फट गई और अन्दर समा गई और स्वर्ग पहुंच गई। जैसी कमाई करेंगे वैसा ही फल मिलता है। मानव अपनी ही कमाई का फल प्राप्त करता है। यही सार इस साखी का प्राप्त हुआ है।