म्हार गुर क पंथ न्यै जुवल्या मेरा बाबा, जांका हरीया भाग। गढ़ वैकुण्ठे अलख लड़ी, चढ़िया जोवै छै माघ। सदरंग कामैण्य माघ जोवै, कदि साध मोमीण्य आवस्यै। नर सतगुर आस पूरव, रतन काया पायस्यै। आरतो ले मुंध आव, सुरंग बाजै दौदही। अनंत बधावा हुवै जा दियां, मंगल गावै मिल्य सही ।१।
हमारे गुरु जाम्भोजी के द्वारा बताये हुए पंथ मार्ग पर जो भी चला है उनका बहुत बड़ा सौभाग्य है। इस जीवन में युक्ति पूर्वक जीते हुए अन्त समय में इस पंथ द्वारा अलख लोक भगवान विष्णु के धाम में चढ़ चुके है। जिस मार्ग से वहां तक पहुंचे है उसी मार्ग को देख रहे है और धन्यवाद दे रहे है। वहां वैकुण्ठ लोक में सदा ही युवती रहने वाली अप्सराऐं ऐसे धर्मात्मा के वहां पर पहुंचने पर स्वागत के लिये प्रतीक्षा करती है। वह दिन कब आयेगा जब भगवान के भक्त हमारे लोक में आयेंगे। सतगुरु की कृपा प्रेम भाव ही हमारी अन्तिम इच्छा पूर्ण करेंगे। यह शरीर तो यहां का यही मृत्यु लोक में ही रह जायेगा किन्तु वहां दिव्य रतन काया मिलेगी। उसी काया से ही उस दिव्य सुखमय लोक में पहुंच सकेंगे। वहां पर प्रेम विभोर होकर नव यौवना अप्सराऐं आरती लेकर स्वागत हेतु सामने आयेगी और अनेक प्रकार बाजे दुदुम्भियां बजने लगेगी। उस दिन अनन्त बधावा स्वागत होगा सखियां मिलकर मंगल गीत गायेगी ।१।
अलखड़ी अरदास्य करै, मो पीव सूं कदि मेला। थारी तीहुगा इकवीस कोड़ि पहुंता, हींडै सहज हींडोला। सहज्य हींडोला तेर साध हींडै, दुख दाल्यद ना तहां। जुग्य चौथ विसन मेलो, इकवीस कोड़ि र बार ही। वैकुण्ठे बेड़ौ विसन ढोयो, सची सार साधा लैविसी। पार गिराय पहुंचाय स्वामी, वास नीहचल देविसी ।२।
जो भी भक्ति प्रेम भाव में भाव विभोर होकर अरदास करती है और अपने पीव परमात्मा से मिलने की प्रबल इच्छा प्रगट करती है। हे गुरुदेव ! अब तक इकवीस करोड़ तो पार पहुंच चुके है। अबकी बार हमारी भी बारी है। हम कब पहुंचेंगे कब मिलेंगे और सदा सदा के लिये जन्म मरण संसार के दुख से छूटेंगे। वहां जो भी पहुंचा है वह सहज रूप से आनन्द में विभोर होकर सुध बुध भूलकर अनहद नाद में मग्न होकर झूल रहे है। हम ही पीछे क्यों रहे। वहां पर किसी प्रकार की दुख दरिद्रता नहीं है इस चौथे युग कलयुग में विष्णु ही जाम्भोजी के रूप में आकर उन तीन युगों के पार पहुंचे हुए लोगों से मिलान करवायेंगे। पार उतारने वाले देवजी निश्चित ही अमरापुर निवास देंगे ।२।
पार गिराए नीतर अजरावण, गुर साहिब सूं लव लीणां। मोमीणा नै मन्यसा भोजन अमी कचोला, पीवणां अमी कचोला। चीर पटोला अख खाणि वर कामणी, तेतीस गढ़ तेरा सदा नीहचल। दैणा संम्रथ तुं धैणी, झिणकार नेवर जोति रतना। कोड पायलज पेखणा, दीदार आगे सभा तेरी। देव देइ नीत देखणां ।३।
पार उतारने वाले सतगुरु जाम्भोजी साधां भक्तां की सुध अवश्य ही लेंगे। मोमण भक्त लोगों को स्वर्ग वैकुण्ठ में मन इच्छित भोजन आदि अमृत की प्राप्ति करवायेंगे। उसी अमृत के प्रभाव से युगों-युगों तक रतन काया लेकर अमर हो जायेंगे। हे देव ! तुम्हारे तेतीस करोड़ जीव सदा निश्चल होकर अमर पद को प्राप्त करेंगे। हे समर्थ ! दाता आप हमें वह अद्भुत ज्योति और अनहद नाद की ध्वनि प्रगट करें तो वह वैकुण्ठ धाम इसी मृत्युलोक में ही प्रगट हो जायेगा। आपकी अद्भुत रचना आपकी कृपा से ही देखना संभव है ।३।
धन्यै धन्य हो जीवड़ा का कायमै राजा, जो म्हानै सुरग्य मीलावै। सोइ दत देइ हो म्हारा कायम राजा, जो थारी गति भावै। दत देह दाता मुकति मन्यसा, रतन काया पार दो। देव दरग मील्या मोमिणा, सुर सभा दीदार दो। अनी पात अनेक अपछरा, हेत बोहरंग्य भाव छ। तेतीस कोड़ि मील्य जांनी, वींद त्रभुवण राव छ ।४।
धन्य धन्य हो हमारे देव सतगुरु कायम राजा को जो हमें स्वर्ग सुख प्राप्त करवाते है। जो अनन्त सुख प्राप्त कर चुके है उन्हीं से हमें भेंट करवाते है। हम भी आपकी तरह दिव्य काया धारी हो सके वही हमें प्रदान करे जो सदा के लिये त्रिस्ना, भूख, नींद नहीं व्यापे और इस जीवन को सुख पूर्वक जीते हुए अन्तिम में मोक्ष मुक्ति को प्राप्त कर सके जिस प्रकार विवाह में दुल्हा प्रमुख होता है और सभी बाराती होते है उसी प्रकार आप ही हमारे तो राजा हो हम आपके बाराती है। हे देव ! आप हमें भटकना छुड़वाकर नित्य सुख परमानन्द की प्राप्ति करवा दीजिये। आप तो सुख आनंद के आगार है। आप हमें अपने पास बुला लीजिये। हम आपके दास है। आप हमारे स्वामी है। हम दास जब तक अपने स्वामी वींद से नहीं मिलेंगे तब तक हमें शांति कैसे मिल सकती है ।४।