कवि परिचय
हरजी वणियाल
9 साखियाँ
परिचय
हरजी वणियाल जन्म संवत् 1745-1835 मध्य अनुमानित है। ये जांगलू के वणियाल गोत्र के बिश्नोई गृहस्थ थे। ये दामोजी के शिष्य थे। ऐसी प्रसिद्धि है कि हरजी ने स्वयं एक पोथी लिखी थी। उसका आधार भी परमानन्द जी ने "पोथो ग्रन्थ ग्यान संग्रह" में लिया था। ये स्वयं ऐतिहासिक एवं पौराणिक कथाओं का आधार मानकर साखियों का सृजन करते थे। इनके द्वारा रचित साखियां वर्तमान काल में सर्वाधिक प्रचलित है। ये साखियां प्रायः जागरणों में गायी जाती है। हरजी ने जो भी रचना की है वह उच्चकोटि की काव्य रचना कही जा सकती है। नीचे उनके द्वारा रचित साखियों का भावार्थ किया जा रहा है।
इनकी साखियाँ
साखी छन्दां की-111
लोहट तणी जे लाज, पत राखो पूरा धणी
साखी छन्दां की-112
सही विसवा वीस, सांचो गुरू समराथले
साखी छन्दां की-113
महिपत मछ अवतार, संखासुर संतापियो
साखी छन्दां की-114
राजा बलि के द्वार, जांचण आयो नरहरि
साखी छन्दां की-115
मन को बूरो स्वभाव, इनके मते न चालिये
साखी छन्दां की-116
मन सो बुरो न कोय, शिव शंकर संतापिया
साखी छन्दां की-117
रे मन मूरख नहचा तूं रख, भगवत तणां भरोसा
साखी छन्दां की-118
फिटि रे नर फिटि फीटो फिरै, थूल सूं जाय करि प्रीति जोड़ै
साखी दोहे-119
देव तणी परमोध में, कसर्वै समो न कोय