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गुरु जम्भेश्वर भगवान
संग्रह112 / 156

साखी छन्दां की-112

सही विसवा वीस, सांचो गुरू समराथले

कवि: हरजी वणियाल

कवि परिचय — हरजी वणियाल

हरजी वणियाल जन्म संवत् 1745-1835 मध्य अनुमानित है। ये जांगलू के वणियाल गोत्र के बिश्नोई गृहस्थ थे। ये दामोजी के शिष्य थे। ऐसी प्रसिद्धि है कि हरजी ने स्वयं एक पोथी लिखी थी। उसका आधार भी परमानन्द जी ने "पोथो ग्रन्थ ग्यान संग्रह" में लिया था। ये स्वयं ऐतिहासिक एवं पौराणिक कथाओं का आधार मानकर साखियों का सृजन करते थे। इनके द्वारा रचित साखियां वर्तमान काल में सर्वाधिक प्रचलित है। ये साखियां प्रायः जागरणों में गायी जाती है। हरजी ने जो भी रचना की है वह उच्चकोटि की काव्य रचना कही जा सकती है। नीचे उनके द्वारा रचित साखियों का भावार्थ किया जा रहा है।

सही विसवा वीस, सांचो गुरू समराथले । कान्ह कुंवर नन्दलाल, कृपाकर आयो भले । कृपाकर आयो भले नैं, थली चरावै थाट । परच्या बामण बाणियां नैं, भोजग चारण भाट । पवन छतीसों एकल सतगुरू, ज्ञान दियो जगदीश । चरण वन्द कर चलूं जे लीनों, सही विसवा वीस । साचो गुरू समराथले ।१।

शत प्रतिशत यह सत्य है कि सतगुरु देव सम्भराथल पर आये है । सतगुरु स्वयं द्वापर युग में कृष्ण कुंवर नन्द जी के आनन्द रूप ही थे । नन्द नन्दन गोपाल ही कृपा करके यहां पर आये है, ऐसी दिव्य कृपा करके आये है, जो किसी राजमहल में सुख नहीं भोग रहे है किन्तु थलों पर गऊ आदि पशु चरा रहे है, इसलिये सभी के लिये सुलभ भी है । सर्व सामान्य जन उनसे भेंट कर रहे है तथा परिचित हो चुके है, अपने जीवन का सुधार कर लिया है । ब्राह्मण बनियां भोजक चारण भाट आदि तीन वर्ण के लोग पास में आये तथा उन्हें ज्ञान दिया । सभी ने हाथ जोड़कर चरणामृत यानि पाहल लिया और सतगुरु की शरण ग्रहण की थी । ऐसे गुरुदेव सम्भराथल पर आये है ।१।

पूरे गुरू परमोध, सुपह सुमार्ग आणियां । शोध्या जीव सुजीव, मोक्ष मुक्त दिस ताणियां । मोक्ष मुकत दिस ताणियां नैं, किया पर उपकार । जाटां ऊपर झुक पड़ा नैं, हमकले अवतार । जंगी-जंगी परसतियां नैं, राता कलहर क्रोध । अड़क नर परचाविया, पूरे गुरू परमोध । सुपह सुमार्ग आणियां ।२।

पूर्ण गुरु ने प्रबोधित किया अर्थात् गहरी निंद्रा में सोये हुए लोगों को जगाया तथा नीति मर्यादा का अच्छा मार्ग बताया एवं उन्हें सुमार्ग पर चलाया । सुजीवों का सोधन अर्थात् जो मुमुक्षु जन थे उनको पार किया, मोक्ष मुक्ति का मार्ग दिखाया, साधारण जीवों को भी धर्म के मार्ग पर लगाया । ऐसा मार्ग दिखा करके महान परोपकार का कार्य किया, इस अवतार में विशेष रूप से जाटों पर महान कृपा की है । बड़े-बड़े मूर्ख अहंकारी जाटों को परास्त किया जो सदा ही कलह क्रोध में रचे पचे थे । ऐसे अड़क अज्ञानी नरों को परचाया, उन्हें सन्मार्ग में लाया, यही उन्हें जागृत करना था, सुमार्ग में लाना था ।२।

प्रगट्यो पूरण भाग, सांचो गुरू समराथले । दाख्यो आदू माघ, कृपा कर आयो भले । कृपा कर आयो भले नैं, धणी जे आयो धाय । भव सागर में डूबतां नें, काढ़ लियो गुरू सहाय । ओर गुरां नैं जंभगुरू में, अन्तर हंसरूं काग । परम गुरू संसार आयो, प्रगट्यो पूरण भाग । सांचो गुरू समराथले ।३।

हमारा पूर्ण भाग्य उदय हुआ था इसलिये सतगुरु यहां इस मरूभूमि में आये, सम्भराथल पर सतगुरु आये है । आदि अनादि का सत्य वैदिक मार्ग हमें भूले भटके लोगों को बताया । कृपा करके यहां पर इस भले कार्य के लिये आना हुआ, ऐसी देव ने महान अनुकम्पा की जो हमारे लिये प्रेम से पूर्ण होकर यहां पर अतिशीघ्र से दौड़कर आये । हम तो भवसागर में डूब रहे थे, डूबते हुए हम लोगों को बचा लिया । अन्य गुरु जो लोगों को भ्रम में डालते है, पाखण्डी है, सत्य मार्ग से दूर है, ऐसे कौवे जैसे है, किन्तु हमारे गुरु तो हंस जैसे है जो विवेक द्वारा दूध का दूध और पानी का पानी कर देते है । इस प्रकार से दोनों में अन्तर है । परम गुरु संसार में आये है, भाग्य ही महान था इसलिये अति निकट सम्भराथल पर आकर प्रगट हुए है ।३।

गुरू दीन्हीं मोक्ष बताय, भव भवतो भूला फिरे । रीझ करी सुर राय, मन इच्छा कारज सरे । मन इच्छा कारज सरै नैं, हरे जे पोते पाप । भाव सूं भक्तां गुरू मिलिया, कलूं पधारया आप । पींपासर प्रगट्यो दई, देव जे आयो दाय । घर लोहट के अवतरा नैं, दीन्हीं मोक्ष बताय । भव भव तो भूला फिरे ।४।

गुरु ने हमें मोक्ष का मार्ग बता दिया है । हम तो कई जन्मों से भूले हुए संसार में भटक रहे थे । देवाधिदेव विष्णु ने ही हमारे से प्रेम किया है । इस समय जैसा हम चाहते है, हमारी मनोकामना अवश्य ही पूर्ण हो जायेगी । इच्छानुसार कार्य पूर्ण होगा तथा पूर्व जन्म के किये हुए पाप जमा पड़े होंगे तो उनका हरण करके मिटा देंगे । भक्तों की शुद्ध भावना के अनुकूल ही कलयुग में स्वयं आकर भक्तों से भेंट की है । श्री देव पींपासर में प्रगट हुए है, जिसे भी देव अच्छे लगे वे जाकर भेंट करें । लोहट के घर पर अवतार लेकर मोक्ष का मार्ग बताया है । हम तो जन्म जन्मान्तरों से संसार में भटक रहे थे ।४।

गुरू किया निपट निहाल, पाप करन्ता पालिया । सत् त्रेता की चाल, थरपण एकण थापिया । थरपण एकण थापिया नैं, आप दियो गुरू ज्ञान । विष्णु भणों विश्नोइयां, थे धरो जे स्वयंम्भू ध्यान । शील सिनान सुचाल चालो, मानों हक हलाल । जिन हरजी की बीणती, गुरू किया निपट निहाल । पाप करन्ता पालिया ।५।

सतगुरु ने हमें कृत्य कृत्य कर दिया, अन्तिम लक्ष्य तक पहुंचा दिया, पाप करते हुए हम लोगों को निवृत कर दिया । सत त्रेता की मर्यादा पर हमें चला दिया । अनुपम बिश्नोई पन्थ की स्थापना कर दी है । गुरु ने ज्ञान से सभी को पवित्र किया है । हे बिश्नोइयों ! आप लोग विष्णु का जप करो, वही विष्णु ही स्वयंभू है, उन्हीं का ध्यान करो, शील व्रत का पालन करो, नित्य ही स्नान करो, नीति मर्यादा पर चलो, हक की कमाई की आशा रखो, किसी से बेहक की छीना झपटी न करो । हरजी विनती करते हुए कहते है कि सतगुरु ने हमें अत्यन्त निहाल कर दिया, आनन्दमय कर दिया, पाप करते हुए लोगों को रोक दिया ।५।