कवि परिचय — हरजी वणियाल
हरजी वणियाल जन्म संवत् 1745-1835 मध्य अनुमानित है। ये जांगलू के वणियाल गोत्र के बिश्नोई गृहस्थ थे। ये दामोजी के शिष्य थे। ऐसी प्रसिद्धि है कि हरजी ने स्वयं एक पोथी लिखी थी। उसका आधार भी परमानन्द जी ने "पोथो ग्रन्थ ग्यान संग्रह" में लिया था। ये स्वयं ऐतिहासिक एवं पौराणिक कथाओं का आधार मानकर साखियों का सृजन करते थे। इनके द्वारा रचित साखियां वर्तमान काल में सर्वाधिक प्रचलित है। ये साखियां प्रायः जागरणों में गायी जाती है। हरजी ने जो भी रचना की है वह उच्चकोटि की काव्य रचना कही जा सकती है। नीचे उनके द्वारा रचित साखियों का भावार्थ किया जा रहा है।
महिपत मछ अवतार, संखासुर संतापियो । जन्म हुवो तिण बार, जल में जाय बुहावियो । जल में जाय बुहावियो नै, माता भयी सधीर । संखावती सहेलिया साथै, गई जल भर तीर । दीठो मच्छ रमंतो रेती, काढ़ लियो कर धार । सूक्ष्म रूप धरयो करूणानिधि, महिपत मछ अवतार । संखासुर संतापियो ।१।
महीपति भगवान विष्णु ने ही मछली का अवतार धारण किया। अवतार लेकर संखासुर दैत्य का विनाश किया। मच्छ का जब जन्म हुआ तो प्रभु की माता संखावती पहचान नहीं सकी और जल में ले जाकर बुहा दिया। प्रभु की माया ही बलवान है उसे कौन जान सका है। पहले तो जल में बुहा दिया पीछे पुत्र मोह के कारण माता दुखी हो गई। अपनी सहेलियों के साथ जल भरने के लिये गयी थी वहां पर जल के किनारे मच्छ को खेलते हुए देखा और दया प्रेम के वशीभूत होकर जल से निकाल लिया। अपने पुत्र से अत्यधिक प्रेम किया। महीपति भगवान ने ऐसा ही सूक्ष्म रूप धारण किया था और संखासुर को मार करके उससे वेद लाकर ब्रह्माजी को वापिस दिया तथा प्रलयावस्था से पूर्व सत्यव्रत राजा को ज्ञान दिया, सृष्टि की वस्तुओं के बचाने का उपाय भी बतलाया और स्वयं सहायक सिद्ध हुए ।१।
कच्छ रूपी किरतार, मलमद कीचक नै हन्यो । बैठो संमद मंझार, वेद लिया ब्रह्मा तणो । वेद लिया ब्रह्मा तणो नै, बैठो समंद मंझार । रीता हाथा जगदगुरु, हरि से करी पुकार । वासग नेतो मेर मथाणी, कर कर सांई सार । इण विध रूप रच्यो मैंणावत, कच्छ रूपी करतार । मलमद कीचक नै हन्यो ।२।
दूसरा अवतार कछुवे के रूप में धारण करके अहंकार के मद में मस्त कीचक को मारा था। ब्रह्माजी से वेद छीनकर समुद्र के मध्य में जाकर बैठ गया था। खाली हाथ जगद गुरु ब्रह्माजी ने जाकर हरि से पुकार की थी। तब हरि ने ही कीचक को मारा था तथा दूसरा कार्य जब देव दानवों ने मिलकर मन्थन किया था तब वासुकी नाग की रस्सी बनायी थी, सुमेरू पर्वत को मथानी बनायी थी, उस समय मथानी को रोकने के लिये कछुवे का रूप धारण करके भगवान ने ही अपनी पीठ लगायी थी। इस प्रकार द्वितीय अवतार ने देव दानव मानव तथा ब्रह्माजी का कार्य पूर्ण किया था ।२।
धर वाराह अवतार, मुरदाणु हरि मारियो । डाढ़ा दई पसार, सारो साथ सिंघारियो । सगलो साथ सिंघारियो नै, पापी किया पहमाल । मुख में रोल रवै ज्यूं राख्या, डाढ़ा बीच दयाल । अपणां संत उबारिया, सही सिरजण हार । पुष्कर तीर्थ प्रगट कियो, धर वाराह अवतार । मुरदाणूं हरि मारियो ।३।
तीसरा अवतार भगवान ने वाराह का धारण किया था। तथा मुर नाम के दैत्य को मारा था। अपनी दाढ़ों को फैला दी तथा मुर दैत्य सहित सभी दानवों को मार गिराया था। पापियों को मारकर धरती को पवित्र किया था। दूसरा कार्य भी हिरण्याक्ष दैत्य को मार करके धरती को जल से बाहर निकाला था। सम्पूर्ण धरती को इस प्रकार से धारण किया। जिस प्रकार से एक मिट्टी के कण को मुख में धारण कर लेते है। अपने संतों की रक्षा की थी। पुष्कर तीर्थ प्रगट किया। इस प्रकार से बाराह अवतार धारण करके भगवान ने अनेक शुभ कार्य किये ।३।
बाबै धारयो नरसिंह रूप, पत राखी पहलाद की । छूट गयी करतूत, आवाज सुणी सिंघ साध की । आवाज सुणी सिंघ साध की नै, भाज गयो अहंकार । दाणू भाग्यो डरपा लाग्यो, कर पकड़यो करतार । किया पावै आपका, खाड खिणता कूप । हरजी संता कारणै, बाबै धारयो नरसिंह रूप । पत राखी पहलाद की ।४।
चतुर्थ अवतार भगवान विष्णु ने नृसिंह का धारण किया। प्रहलाद की प्रतीज्ञा पूर्ण करते हुए रक्षा की थी। उस समय नृसिंह की दहाड़ हिरण्यकश्यपु ने सुनी तो अपनी सम्पूर्ण करतूत भूल गया। ऐसी भयंकर आवाज सुनते ही अहंकार निवृत हो गया। भगवान नृसिंह को देखा तो वह वहां से भागने लगा था। तुरन्त नृसिंह ने हिरण्यकश्यपू का हाथ पकड़ लिया और अपने नाखुनों से चीर डाला। अपने किये हुए कर्म तो स्वयं ही भोगा है। यदि कूवा स्वयं ही खोदोगे तो उसमें कोई दूसरा क्यों पड़ेगा। हरजी कहते है कि संतों के लिये भगवान ने नृसिंह रूप धारण किया था और प्रहलाद की रक्षा की थी ।४।