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गुरु जम्भेश्वर भगवान
संग्रह114 / 156

साखी छन्दां की-114

राजा बलि के द्वार, जांचण आयो नरहरि

कवि: हरजी वणियाल

कवि परिचय — हरजी वणियाल

हरजी वणियाल जन्म संवत् 1745-1835 मध्य अनुमानित है। ये जांगलू के वणियाल गोत्र के बिश्नोई गृहस्थ थे। ये दामोजी के शिष्य थे। ऐसी प्रसिद्धि है कि हरजी ने स्वयं एक पोथी लिखी थी। उसका आधार भी परमानन्द जी ने "पोथो ग्रन्थ ग्यान संग्रह" में लिया था। ये स्वयं ऐतिहासिक एवं पौराणिक कथाओं का आधार मानकर साखियों का सृजन करते थे। इनके द्वारा रचित साखियां वर्तमान काल में सर्वाधिक प्रचलित है। ये साखियां प्रायः जागरणों में गायी जाती है। हरजी ने जो भी रचना की है वह उच्चकोटि की काव्य रचना कही जा सकती है। नीचे उनके द्वारा रचित साखियों का भावार्थ किया जा रहा है।

राजा बलि के द्वार, जांचण आयो नरहरि । बावन रूप मुरार, तीन पैंड वसुधा करी । तीन पैण्ड वसुधा करी नै, लीन्ही देह बधार । भूप कहै सुंण देवता, मापो पीठ हमार । आया था हरि बलि छलन को, आप गये हरि हार । चार महीने तापसी नै, राजा बलि के द्वार । जांचण आयो नरहरि ।१।

पांचवां रूप भगवान ने बावन रूप में धारण किया तथा राजा बलि के यहां यज्ञशाला में पहुंचे थे। बलि के पास याचक बनकर गये थे। भगवान ने बावन ही अंगुल का रूप बनाया था। बलि ने भगवान के मांगने पर तीन पैंड भूमि का दान दिया था। धरती मापने के लिये बावन रूप धारी विष्णु जब शरीर का विस्तार करने लगे तो एक पैंड से धरती को नापा दूसरे में स्वर्ग लोक को भी नाप लिया। भगवान ने कहा बलि ! अब तीसरा पैर कहां रखूं ? तब बलि ने सचेत होकर कहा कि मेरी पीठ नाप लो। ज्योंहि भगवान ने पीठ पर पांव रखा त्योंहि बलि पाताल लोक में चला गया। भगवान ने अपना पैर वापिस खींचा तब बलि ने पकड़ लिया और कहा अब कहां जाओगे? अब तो मेरे पास यहीं रहो। हरि गये थे बलि को परास्त करने के लिये किन्तु हरि स्वयं ही हार गये। चार महीने चौमासे में अब भी राजा बलि के यहां पर भगवान निवास करते है। बाकी महीनों के लिये लक्ष्मी के पास वैकुण्ठं में निवास करते है। ऐसी हरि ने याचना की थी ।१।

सहसां अर्जुन आय, कामधेनु हड़ ले गयो । जमदग्नि रैण का माय, दोनों ने दुख दे गयो । दोनों ने दुख दे गयो नै, पुत्र हेत पुकार । कीवी माता रैण का नै, कान पड़ी भणंकार । उठियो पुरूष ध्यान तज नै, लीन्हो धनुष उठाय । एक बाण सो मारियो, सहंसा अर्जुन आय । कामधेनु हड़ ले गयो ।२।

छठा अवतार हरि ने परशुराम के रूप में धारण किया था। माता रेणुका एवं पिता जमदग्नि के पास से कीर्तवीर्य सहस्राबाहु अर्जुन कामधेनु हरण करके ले गया था। जब परशुराम जी के माता-पिता दोनों ही दुखी हो गये तो महेन्द्र पर्वत पर तपस्या में लीन अपने पुत्र परशुराम को याद किया तब परशुराम ने आकर सहस्रार्जुन सहित सभी क्षत्रियों का विनाश कर दिया था। अपनी ध्यानावस्था को त्यागकर परशुराम ने इकीस बार क्षत्रियों का नाश किया था। ऐसे परशुराम के रूप में हरि विष्णु ही थे ।२।

सोलह सहस्र चौक, रावण के घर स्त्री । राज गयो निरवंश, राम तणी सीता हड़ी । राम तणी सीता हड़ी नै, आण पहुंतो अंत । लंका तोड़ी कंध मरोड़ी, महा बली हणुमंत । इक लख पुत्र सवा लख नाती, रिव किरणा में हंस । पाट सिरै मंदोदरी, सोलह सहस्र चौक । रावण के घर स्त्री ।३।

सातवां अवतार हरि ने राम के रूप में लिया था। लंकापति रावण को मारने के लिये ही यह अवतार विशेष रूप से हुआ था। रावण की लंका में सोलह सहस्र स्त्रियां थी जो सुन्दरियां थी। फिर भी अपने राज्य का तथा कुल का विनाश करने के लिये सीता का हरण किया था। सीता हरण का अर्थ था कि रावण का अन्त आ गया था। राम वानरी सेना लेकर लंका में पहुंचे थे। साथ में महाबलि हनुमान थे। जिन्होनें लंका तोड़ डाली, राक्षसों के कंधे मरोड़ डाले थे। जिस रावण की लंका में एक लाख सैनिक पुत्र की भांति रावण की रक्षा करने में तत्पर थे तथा सवा लाख नाती पोते आदि सम्बन्धिगण भी थे। जिस रावण की जीवात्मा का निवास सूर्य की किरणों में था। नाभि देश में जीव रहता था जहां अमृत कुण्ड में अमृत पान करता था जिसके बल पर रावण मरता नहीं था। जिस रावण के यहां शिरोमणी रानी मंदोदरी थी। इतना होते हुए भी रावण की रक्षा नहीं कर सकी। सभी कुछ व्यर्थ में ही चला गया। वही रावण राम लक्ष्मण के हाथों मारा गया ।३।

परवाड़ा अनेक, किसन देव किया घणां । महा दुष्ट कंस एक, पकड़ पिछाड़ियो आंगणां । पकड़ पिछाड़ियो आंगणां नै, बला जे कारी बाल । टांग पकड़ अरू ठरड़ियो, अजहूं कहै कंस खाल । उग्रसेन को राज तिलक दियो, रही भक्तां की टेक । मथुरा पूरी बधावणां, परवाड़ा अनेक । किसन देव किया घणां ।४।

आठवां अवतार श्री हरि ने कृष्ण के रूप में धारण किया था। कृष्ण ने अवतार लेकर अनेकों विचित्र कार्य किये थे। महादुष्ट कंश को राज गद्दी से खींचकर आंगन में पटक दिया था और उसे मार डाला था। जहां पर टांग पकड़कर नीचे घसीटा था वहां पर अब भी खाल निशान पड़ा हुआ है। जिसे कंस खाल कहा जाता है। अपने नाना उग्रसेन को राज सिंहासन पर बैठाकर राजतिलक दे दिया। सदा ही भक्तों की रक्षा की है। मथुरापुरी में मंगलगान होने लगा तथा बधाइयां बंटने लगी। कृष्ण देव ने तो अनेकों दिव्य चरित्र किये है कहां तक गिनाये जिनका कोई पार ही नहीं है ।४।

ऊंडो नीर अथाघ, जुग सारे हो तो सही । पगे पगे पग पाय, कलयुग कीवी गुरु जम्भ ही । कलियुग कीवी गुरु जम्भ ही, पगे पगे पगवाय । अमृत जल से हेम भरी, हर कोई पीवण जाय । हरजी गरजी मुक्ति का, दर्शन दो सुरराय । जम्भ गुरु से वीणती, अब के मोहे मिलाय । पार उतारो गुरु देव जी ।५।

नवें अवतार में हरि ने बुद्ध रूप धारण किया था। बुद्ध आदि नवों अवतार जो कार्य पूर्ण नहीं कर सके अर्थात् अवशिष्ट कार्य को पूरा करने के लिये ही जाम्भेश्वर जी के रूप में श्री हरि आये थे। उस समय जल बहुत ही गहरा था अर्थात् ज्ञान की प्राप्ति भी गहरे जल की भांति दुर्लभ ही थी। एक देश की बात नहीं सम्पूर्ण देशों की यही हालत थी। ज्ञान का अधिकार एक वर्ग विशेष तथा संस्कृत भाषा में ही प्राप्त था। यह सर्व साधारण के लिये सुलभ नहीं था। कलयुग में आकर जाम्भेश्वर जी ने वही जल यानि ज्ञान कदम कदम पर सुलभ कर दिया। अमृत जल सोने के घड़े में भरा हुआ है, सभी कोई आकर पान करें। किसी के लिये प्रतिबन्ध एवं कठिनता नहीं है अर्थात् स्वर्ण घड़ा रूपी मातृभाषा में अमृत रूपी ज्ञान शब्दवाणी में भरा हुआ है। यह शब्दवाणी मातृभाषा में श्री गुरुदेव ने उपलब्ध करवायी है इससे प्राप्त होने वाला ज्ञान अजर अमर कर देने वाला है। हरजी विनती करते हुए कहते है कि हे गुरुदेव ! मुझे तो केवल मुक्ति ही चाहिये यही मेरी परम इच्छा है। अबकी बार आप मुझे विष्णु से मिला दीजिये, जहां से वापिस जन्म मरण के चक्कर में न आना पड़े ।५।