कवि परिचय — हरजी वणियाल
हरजी वणियाल जन्म संवत् 1745-1835 मध्य अनुमानित है। ये जांगलू के वणियाल गोत्र के बिश्नोई गृहस्थ थे। ये दामोजी के शिष्य थे। ऐसी प्रसिद्धि है कि हरजी ने स्वयं एक पोथी लिखी थी। उसका आधार भी परमानन्द जी ने "पोथो ग्रन्थ ग्यान संग्रह" में लिया था। ये स्वयं ऐतिहासिक एवं पौराणिक कथाओं का आधार मानकर साखियों का सृजन करते थे। इनके द्वारा रचित साखियां वर्तमान काल में सर्वाधिक प्रचलित है। ये साखियां प्रायः जागरणों में गायी जाती है। हरजी ने जो भी रचना की है वह उच्चकोटि की काव्य रचना कही जा सकती है। नीचे उनके द्वारा रचित साखियों का भावार्थ किया जा रहा है।
रे मन मूरख नहचा तूं रख, भगवत तणां भरोसा । कीट पतंग सकल कूं पोखे, दई न दीजै दोसा । दोस न दीजै हरि सिंवरीजै, चित बरत नटणी ज्यूं रख । बार बार समझायो तो कूं, विसन सिंवर मन मूरख ।१।
रे मन मूर्ख ! तूं बार-बार मूर्खता क्यों करता है धैर्य धारण कर। भगवान पर भरोसा भी रखो। जो पूर्ण परमात्मा है वह सभी कीट पतंगों से लेकर आदमी तक का पालन पोषण करने वाला है वह तुम्हारी रक्षा करेगा। यदि कभी कोई कार्य सम्पूर्ण नहीं हो पाता है तो देव को दोष मत दें। वह तो तुम्हारे परिश्रम में ही कहीं भूल होगी। इसलिये व्यर्थ में किसी अन्य को दोष न दें, हरि का स्मरण भजन करें। अपनी चित वृति को एकाग्र करें जिस प्रकार नटणी रस्से पर चलते समय अपनी दृष्टि एकाग्र करके रस्से पर ही टिका देती है इसलिये बिना किसी सहारे के रस्से पर चल लेती है। ऐसे ही चितवृति एकाग्र होनी चाहिये। रे मन मूर्ख ! मैनें तुझे बार-बार यही समझाया कि तूं विष्णु का ध्यान स्मरण कर ।१।
रे मन कायर भजि हरि सायर, छिलरीयां कांय सोधे । देवी देवां धोके मूरखां, भौपा भांड परमोधे । परमोधे भोपा मति हीणा खोपा, बैठो मूंड मुंडायर । परपंथ करि जग समुलाणा, बात सुणी मन कायर ।२।
रे मन ! तूं कायर है। हरि के भजन से दूर भागता है। सावधान होकर हरि का भजन करें। छिलरीये में हरि कहां मिलते है यहां संसार के विषय भोगों में आनन्द कहां ढूंढ़ता है। रे मूर्ख ! क्षुद्र देवी देवताओं तथा भूत प्रेतों को धोक लगाता है और पण्डों भाण्डों को प्रसन्न करता है उन्हें चढ़ावा चढ़ाता है वे तुम्हारा क्या भला कर देंगे। जो स्वयं मरकर प्रेत बन गये है या जीवित ही दुखी है वे तुम्हें सुख कहां से दे देंगे। भोपों को जगाता है उनसे मांगता है तो बुद्धिहीन बैल की तरह ही है। वे तो स्वयं ही दुखी होकर सिर मुंडा कर बैठ गये है उनके पास सुख कहां रखा है। ये भोपे लोग तो अनेकों पाखण्ड करके जगत को भ्रम में डालते है। वहां क्या मिलेगा। इसलिये मेरी बात को सुन तथा धारण कर ।२।
रे मन मंगता क्यूं रातो जगता, जग में कोई न रहसी । राजा राव अरू रंक सुरताणां, एकण मार्ग बहसी । मारग बहसी बदिया लदसी, रोगी रहसी रगता। भजन किया भव सागर तरसी, बात सुणी मन मंगता ।३।
रे मन ! तूं क्यूं मांगता है यानि भिखारी बनता है। रात्रि में जागकर के जागरण करता है फिर क्षुद्र देवताओं से मांगता है। वहां कुछ भी नहीं मिलेगा। और न ही जगत की कोई वस्तु स्थिर ही रह सकी है। राजा राव रंक सभी एक ही मार्ग से जायेंगे। मृत्यु छोटे बड़े सभी को ग्रसित कर लेगी। सभी उसी मार्ग से चलेंगे तथा अपने कर्मों का हिसाब किताब लाद कर ले जायेंगे। इस परंपरा से कोई नहीं बच पायेगा। जो हरि का भजन करेगा वह भवसागर से पार उतर जायेगा। हे मंगते मेरा मन ! इस बात पर विश्वास करके सन्मार्ग पर लग जाओ ।३।
रे मन भंवरा ताकम जंबरा, ताको जतन जु कीजै । कांटे वाली केतकी है, बांको रस नहीं पीजै । रस नहीं पीजै कांनो लीजै, मत ले लाहा लबरा । जन हरजी जे हरि कूं सिंवरे, तो उधरे मन भंवरा ।४।
रे मन ! तूं भंवरे की भांति अनेक पुष्पों पर बैठकर रस ग्रहण करता है। तेरी ताकत महान है किन्तु मृत्यु के सामने तेरी ताकत मंद पड़ जायेगी। उस मृत्यु के ग्रास से बचने की कोशिश करनी चाहिये। यह संसार तथा विषय भोग तो कांटे वाली केतकी के फूल है। इसका रस ग्रहण करने के लिये उतना उतावला न हो क्योंकि इस चक्कर में कांटे चुभ जायेंगे। इस प्रकार के रस से दूर रहना ठीक होगा। ऐसे सुख से भी क्या लाभ जिसके पीछे दुख आ रहा हो। रे भंवरा ! हरजी कहते है कि यदि हरि का स्मरण करेगा तो जन्म मृत्यु से बच जायेगा अन्यथा भटकेगा ।४।