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गुरु जम्भेश्वर भगवान
संग्रह116 / 156

साखी छन्दां की-116

मन सो बुरो न कोय, शिव शंकर संतापिया

कवि: हरजी वणियाल

कवि परिचय — हरजी वणियाल

हरजी वणियाल जन्म संवत् 1745-1835 मध्य अनुमानित है। ये जांगलू के वणियाल गोत्र के बिश्नोई गृहस्थ थे। ये दामोजी के शिष्य थे। ऐसी प्रसिद्धि है कि हरजी ने स्वयं एक पोथी लिखी थी। उसका आधार भी परमानन्द जी ने "पोथो ग्रन्थ ग्यान संग्रह" में लिया था। ये स्वयं ऐतिहासिक एवं पौराणिक कथाओं का आधार मानकर साखियों का सृजन करते थे। इनके द्वारा रचित साखियां वर्तमान काल में सर्वाधिक प्रचलित है। ये साखियां प्रायः जागरणों में गायी जाती है। हरजी ने जो भी रचना की है वह उच्चकोटि की काव्य रचना कही जा सकती है। नीचे उनके द्वारा रचित साखियों का भावार्थ किया जा रहा है।

मन सो बुरो न कोय, शिव शंकर संतापिया । पारवती पति खोय, ध्यान अटारन थापिया । ध्यान अटारन थापिया नै, महाबलि मन राय । नाचण लागो डोकरो नै, कर सूं ताली लाय । थुगिदिन थुगिदिन ओचरे, लाग रही धुन सोय । ईश्वर देव नचाविया, मन सो बूरो न कोय । शिव शंकर संतापिया ।१।

मन जैसा उद्दण्ड कोई नहीं है। मन ने ही तो शिव शंकर को संताप दिया। जब मन ने शिव पर अपना प्रभुत्व जमाया था तब पार्वती को त्याग करके अटल ध्यान में स्थित हो गये। ऐसा दिखलाया था मानों अखण्ड तपस्या में लीन हो गये है यही मन जब दूसरी तरफ मुड़ा तो शिव को भी समाधि से खड़ा कर दिया। काम देव को जलाने वाले स्वयं शिव काम के ही वशीभूत हो गये। भगवान विष्णु की त्रिगुणी माया को देखकर शिव नाचने लगे थे। माया की प्राप्ति का उद्योग प्रारम्भ कर दिया था, वह तो माया जो ठहरी शिव के हाथ लगने वाली कहां थी किन्तु शिव तो हाथों से ताली बजाते हुए ताण्डव नृत्य करते हुए माया की प्राप्ति के धुन में थे। शिव के देखते ही देखते माया तो विलीन हो चुकी थी, माया के लुप्त होते ही शिव सचेत हो चुके थे किन्तु अब तक तो ईश्वर देव काफी नृत्य कर चुके थे। ईश्वर को नचाने वाला भी मन ही था। इसलिये कहा है कि मन से बूरो न कोय ।१।

मन बोयो बूबकशाह, लाग रहे मन मोतियां । बड्यो लाकड़े मांय, रहि गयो मुख पोतियां । रहि गयो मुख पोतियां नै, गयो समन्दां तीर । माल भरयो ले कोथला नै, मुक्ता मोती हीर । नारी आई काज कर, ओ बड़ बैठो मांह । गल सूं बांध्या कोथला, मन बोयो बुबक शाह । लाग रहयो मन मोतिया ।२।

रथ पर बैठी नारि, मंत्र पढ़े चूड़ामणी । नारी करै विचार, पोहर एक में जांवणो । पोहर एक मैं जांवणो नै, घणी बीच में दूर । आज लाज कैसे रहै, सही जे ऊगै सूर । रथ भारी हालै नहीं, नारी करै विचार । रथ छिटकायो समंद में, डूबर मरो गिंवार । मंत्र पढ़े चूड़ामणी ।३।

मन ने ही तो बुबकशाह को भ्रमित किया था। वह बेचारा हीरे मोतियों में फंस कर मर गया था। उसकी कहानी इस प्रकार है- साह बूबक सेठ की धर्मपत्नी एवं पुत्र वधु दोनों ही किसी दूर देश अर्थात् स्वर्ग में नित्य प्रति सत्संग श्रवण करने के लिये जाया करती थी। उनके जाने का साधन एक अनघड़ लकड़ था। वह गांव के बाहर पड़ा रहता था। उसी पर बैठकर वे दोनों जाया करती थी। वे मन्त्रों द्वारा उस लकड़े को आकाश मार्ग से उड़ाकर ले जाया करती थी। रात्रि में सभी लोग सो जाते तब वे घर से बाहर निकल कर जाती थी और प्रातःकाल होने से पूर्व ही वापिस आती थी। यह उनका नित्य प्रति का क्रम था। एक दिन सेठ ने यह देख लिया कि ये दोनों रात्रि में कहां जाती है यह पता करना चाहिये। ऐसा विचार करके एक दिन उसने उनका सम्पूर्ण कार्यकलाप देखा और सभी बातें समझ गया। दूसरे दिन उसने उस लकड़े के नीचे एक खोखला बनाया और उनके आने से पूर्व ही वह सेठ बड़े-बड़े कोथले लेकर अन्दर प्रवेश करके बैठ गया। उन सास बहू को तो कुछ पता नहीं लगा वे दोनों रोज की भांति उस लकड़े पर सवार होकर चल पड़ी और जहां पर भी उन्हें जाना था वहीं पर लकड़े को छोड़कर चली गई और सत्संग सुनने लगी। पीछे सेठ ने वहां पर हीरे जवाहारात सोने आदि के आभूषण एकत्रित करके कोथला भर करके उनके आने से पूर्व ही उस लकड़े में जाकर बैठ गया। वे दोनों सास बहू भी आकर नित्य की भांति उस पर सवार होकर चलने लगी। किन्तु आज वह वाहन रूपी लकड़ा काफी वजनदार हो गया था। चलने में परेशानी आ रही थी आज तो वह धीरे चल रहा था। उन्होनें सोचा कि आज घर जाने से पूर्व ही सूर्य उदय हो जायेगा कैसे पहुंचेगी? उन्होनें उस वाहन रूपी लकड़ को समुद्र के बीच में ही छोड़ दिया और मंत्रों के बल से वे अपने घर समय पर पहुंच गई किन्तु वह लालची सेठ अपने धन के सहित ही समुद्र में डूब कर मर गया। इस प्रकार से इस चंचल मन ने बबूकशाह को मृत्यु का ग्रास बना डाला। मन ने ही तो लोभ पैदा किया था, वही लोभ ही उसकी मृत्यु का कारण बना था। वे रत्न धन किस काम आये। यह मन अनेक रूप धारण करके सामने आता है ।३।

मन जाणै सब बात, जाणत ही कावल खड़े । कदे नहीं कुशलात, कर दीपक कूवै पड़े । कर दीपक कूवै पड़े नै, गिणै नहीं परिवार । भाइयां सूं भूंडी करै, मन मति हीण गिंवार । आदि अन्त को चुगलियो, माय बहण लग घात । ओ गुजरै नहीं बाप सूं, मन जाणै सब बात । जाणत ही कावल खड़े ।४।

मन सभी बात जानता है, शुभ अशुभ का उसे पूरा पता है किन्तु सभी कुछ जानते हुए भी विपरीत हो जायेगा, अशुभ ही करवायेगा। मन के पीछे चलने से कभी कुशलता नहीं होगी। यह तो वैसा ही जैसे दीपक का प्रकाश करके कूवे में गिर जाता है। जिसे गिरना ही है उसके लिये प्रकाश भी क्या करे। स्वयं तो गिरता ही है और अपने साथ अपने परिवार को भी गिरा देता है। यह मन अपने ही भाइयों से झगड़ा करवा देता है यह मन मतिहीन गंवार तथा मूर्ख ही है यह मन आदि से लेकर अन्त तक दूसरों की निंदा करने में ही रस लेता है। सच्चाई तथा सद्‌गुणों के निकट ही नहीं जाता। दूसरों से तो चूकेगा ही क्यों? अपनी माता-बहिन से भी नहीं चूकता उनकी भी निंदा कर देता है तथा यह मन तो अपने बाप की भी निंदा अनादर कर देता है। यह सभी बातें जानता भी है और जानते हुए भी उल्टा ही चलता है ।४।

मन का मता अनेक, क्या जाणै जीव बापड़ो । महा मस्त मन एक, सब सिर थापे थापड़ो । सब सिर थापे थापड़ो नै, बापड़ो संसार । सुर नर मुनि जन देवता, सबको करै सिंघार । महा मस्त मानै नहीं, कही न छाड़ टेक । जन हरजी ऐसी कही, मन का मता अनेक । क्या जाणै जीव बापड़ो ।५।

मन के अनेक विचार है वह कभी कभी किस रूप में तो कभी दूसरे रूप में सामने आता है और अपना प्रभाव जमाता है। यह बेचारा जीव क्या जाने इस मन की चालाकी को। यह मन महामस्त अद्वितीय है। यह सभी के मस्तकों पर नाचता है तथा नचाता भी है। इसके सामने सम्पूर्ण संसार बेचारा असहाय मालूम पड़ता है। यह मन ही सुर नर मुनि देवता आदि सभी का संहार कर देता है, सभी को मार देता है इसके सामने सभी बलहीन हो जाते है। यह महामस्त मन किसी की सीख नहीं मानता, अपनी प्रतिज्ञा हठ नहीं छोड़ता। हरजी ने यह बात कही है, इस मन का अनेक विचार रूप लीला तथा रंग है। यह जीव बेचारा क्या जाने। यह तो निर्दोष है किन्तु लोग दोष तो जीव को ही देते है ।५।