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गुरु जम्भेश्वर भगवान
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प्रचलित छन्दा की साखी

साखी-24

नरसिंह नर मुलतान, सतजुग में साको कियो

इस रचना का भावार्थ उपलब्ध नहीं है।

सवैया

कर्म मर्म को सांकली पासी पड़ी शरीर ।

कही केशों खुलै नही जालिम जड़या जन्जीर ।

उतम संग केशो कहे देखी बण्या है दाव ।

अज्या फल उंचा चरै धरी गिरिवर सिरी पांव ।

जे पुलियां धन सांपज़ै सुंणहों फ़िरे सो बार

कहै केशो दिठो नही कुकर के कोठार । ६ ।

नरसिंह नर मुलतान, सतजुग में साको कियो

मारयो दैत दिवान, प्रहलाद भगत गोदी लियो

प्रहलाद भगत गोदी लियो नैं, सिर पर दोनों हाथ

शिव ब्रह्मा आया सही, सुर तेतीसुं साथ

लक्ष्मी हुं लारे लुके, तूं मांग वचन प्रहलाद

बाड़े हूंता बीछड़या, ते आण मिलाओ साधा

कर जोड़यां ऐसे कही ( १ )

कह हरि महाराज, दूर पड़े टोली टलै

सांसो मत कर साधा, चहुं पहरा चौकस मिलै

चहुं पहरा चौकस मिलैं नैं, चार जामैं जुगचार

हरिचन्द पांडव अंस तब, नंद लोहट अवतार

पांच सात नव कोड़ बारां, बहुरि मिलेंगे आण

नहीं तंती नर लोक में, आवै जंभ सुजाण

दुख मेटण मोटा दईं ( २ )

तारयो जन प्रहलाद, हिरणकुश मारयो हरी

असुरां लागी आंच, देख दुनी सारी डरी

देख दुनी सारी डरी नैं, गह्या धर्म उनतीस

अग्नि की पूजा करै, आय निवावे शीश

असुर बुद्ध अलगी भईं, करै शौच सनान

पाहल ले प्रसन्न भया, अरु माने गुरु की आण

दिल की दुबिधा सब गईं ( ३ )

जब का बिछड़या जीव, बिन खोजी पावे नहीं

गया समुन्दरां तीर, बिन लाया आवे नहीं

बिन लाया आवे नहीं नैं, कलजुग बह करूर

भक्ति हमारी कवण करैं, यूं जाण्यो विष्णु जरूर

महाविष्णु को तप कियो, निरंजन निज देश

प्रहलाद कृष्ण के कवल से, आये जंभ नरेश

घट घट व्यापक जंभ वही ( ४ )

लोहट है नन्दराय, जसोदा हांसा भई

मरूस्थल बृजभोम, पींपासर बृज है सई

पींपासर बृज है सई नैं, वचन के प्रतिपाल

कृष्णा कवल के कारणै, गुरु जम्भ लियो अवतार

सत्य लोक को छोड़ के, गुरु किया भगवां भेष

जेठ बदि नौमि दिने, गुरु कियो नंद उपदेश

‘साहब’ सतगुरु है सही ( ५ )